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Saturday, June 12, 2010
10. निगाहें !
स्वप्निल
निगाहें
तुम्हारी
दे
रही
जन्म
लाखों
अरमानों
को
!
शम्मा
-
ए
-
महफिल
हो
तुम
समेट
लो
इन
परवानों
को
!!
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