Saturday, June 12, 2010

31.प्रतीक्षा में प्रियतम की !

सावन के नभ देश में, काली घटा लहराई है !
हरी भरी धरित्री पर, बन वर्षा वधू आई है !!
है हर्षित चातक चतुर
चकोर चकोरी भयभीत,
नृत्यरत तन्मय मोर है
गाये शुक-पिक नवगीत,
अधर अधीर है आज, तरूलता तरूणाई है !
मिट्टी की सौंधी मीठी महक
पँछी-सा चित्त उठा चहक,
देख हरियाली चहुँ ओर
तरूण-मन उठा दहक,
मन मचल रहा आज, चली हवा पुरवाई है !
आ रहा याद बीता सावन
संग दोनों थे ‘राधा किशन
आज जुदाई के आलम में
सीहर से उठते तन मन,
झींगुर की तान सुहानी, लगती ज्यों शहनाई है !
पल पल अमल सजल
उमंग जगाती स्वाती बूँद
विरह बेला में विरहिणी
लेती विवश हो आँखें मूँद,
यादों में प्रियतम की क्यों, आँखें आज भर आई है !
हे पावस की पावन-पवन
संग ले जाओ यह सन्देश ,
लौटे नहीं हैं अब तक क्यों
गये पिया जो हैं परदेश ,
देखो तन बदन में यूँ, आई कैसी अंगड़ाई है !
मुरझाया है मन-सुमन
शुष्क अधर उदास नैन,
चन्दन-सा है कया कंचन
विरह विषधर बेचैन,
मुक्त केश उन्मुक्त वेष में, बैठी आस लगाई है !
है प्रतीक्षा में प्रियतम की
निर्निमेष नयन सनीर,
तीर सम उर चीर कर
बह रहा सुधीर समीर,
देख ‘अजनबी’ को एक, आँखें पुनः धोखा खाई है !

No comments:

Post a Comment