मूल : डॉ. अर्चना नायक (savitrimagazine@yahoo.com)
सं-‘सावित्री’, 102 शहीद नगर, भुवनेश्वर -7, (ओड़िशा)
Mo : 09437227820
अनु : कृष्ण कुमार ‘अजनबी’
(ajnabikrishna@gmail.com)
Mo : 09406048248
सं-‘सावित्री’, 102 शहीद नगर, भुवनेश्वर -7, (ओड़िशा)
Mo : 09437227820
अनु : कृष्ण कुमार ‘अजनबी’
(ajnabikrishna@gmail.com)
Mo : 09406048248
इतने सालों के घरेलु सामान भरे पेडे़ थे। लड़के की किताब कापियां और वर्षो की अखबार ढेर बन गई थी। अतः उसे बेचने हेतु एक कबाड़ी वाले को बुला लिया था मैंने। उसने इन अखबारों को तौलते वक्त एक बंद लिफाफा पाकर मेरी ओर बढ़ा दिया था । मैंने देखा यह खत अमेरिका से आया हुआ है और अब तक खुला भी नहीं हैं। उस पर कई सारी मुहरें भी लगी हुई हैं। अलग-अलग पते भी लिखे हुए हैं। हो सकता है बीजेबी कॉलेज के मेरे पुराने पते पर खत आते वक्त मैं वहां से तबादला होकर बारीपदा चली गई हूँगी। पर वहां फिर कैसे घर के पते पर लौटा। हो सकता किसी ने यूं ही लिख दिया हो। जो भी हो मुहर से पता चला कि वह चार महीने पहले की चिटठी है। उस वक्त तो मैं यहीं थी। फिर कैसे नहीं मिली ? हो सकता है हमारी अनुपस्थिति में पोस्ट मैन ने लैटर बाक्स में डाल दिया हो और बाद में अखबार में हीं दबकर रह गया हो यह लिफाफा जो हम दोनों में से किसी की भी नजर उस पर पड़ी ही नहीं। और आज एकाएक़..............
मैंने शीघ्रता से लिफाफा खोला। मेरी जानकारी में अमेरिका में अपना कोई नहीं है, जो हमें खत लिखे फिर कौन हो सकता है। आश्चर्य मिश्रित हर्ष के साथ मैंने खत निकालकर पढ़ा, तो ‘माँ जी !‘ कह कर सम्बोधित हुआ है। खत के अंत में आपका...........देव लिखा हुआ है । मुझे तुरंत कुछ याद नहीं आया, कौन हो सकता है ! यही सोचकर मैंने खत पढ़ना शुरू किया। लिखा है ‘आप मुझे पहचानेंगी भी या नहीं ! मैं आपको को याद दिला देता हूँ। बचपन में जो लड़का आपके रिक्शे को पीछे से ढकेल दिया करता था, राम मंदिर के पास वाले चढ़ाव पर, मैं वही देवव्रत हूँ।‘‘
अब मुझे उसकी याद हो आई। लगभग पन्द्रह साल पहले मैं बीजेबी मॉर्निग कॉलेज में अध्यापिका थी। सत्यनगर में ही रहती थी। वहीं से सुबह कॉलेज जाती थी। सिटी बस बहुत देर लगा देती थी चूंकि हर स्टॉपेज में उसे रूकना जो होता था। सात बजे समय पर पहुँच ना पाऊं यही सोचकर मैं रिक्शे पर जाती थी। पर कछुए की चाल में इतना लम्बा सफर तय करने में वक्त बर्बाद क्यों हो, लिहाजा मैं कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते जाती थी, ताकि समय का कुछ तो सदुपयोग हो।
राम मंदिर के पास वाले चढ़ाव पर रिक्शावाला रिक्शे से उतरकर काफी जोर लगाकर रिक्शा खींचता था। उसकी हालत देख मुझे तरस तो आता पर मैं भला क्या कर सकती थी ! एक रोज मैंने देखा उस चढ़ाव पर रिक्शा आराम से गुजर रहा है। हैरत हुई, पीछे पलट कर देखा तो बारह-तेरह साल का एक लड़का पीछे से ढकेल रहा है। मैंने कुछ नहीं कहा। रिक्शा आगे निकल गया। उसके दूसरे दिन भी फिर वही लड़का दौड़ते हुए आया, और रिक्शे को पीछे से ढकेलने लगा। इसी तरह लगातार चार-पाँच रोज जब ऐसा ही कुछ हुआ तो मैंने रिक्शा रूकवाकर उस बालक से पूछा, ‘‘ तुम्हारा नाम क्या है ?‘‘
- देवव्रत। संक्षिप्त सा उत्तर।
- बहुत अच्छा नाम है! यहाँ क्या करते हो,सुबह-सुबह?
- ‘साब‘ के लिए दूध लेने जाता हूँ।
- अच्छा, तो फिर सभी रिक्शे को पीछे से ढकेलते हो या फिर मेरे ही..?
कुछ देर बाद उसने कहा, ‘‘ नहीं, सिर्फ आपके ही ! पर कभी-कभी आप बहुत देर कर देती हैं आने में - जब तक मैं दूध लेकर चला जाता हूँ। ‘‘
मैंने उसकी पहली बात को पकड़ कर पूछा ,‘‘ मेरे ही क्यों ? ‘‘
‘‘आप मुझे अच्छी लगती हैं! ‘‘ उसने सहज होकर कहा।
मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘‘ अच्छा ! तो ऐसा क्यों ?‘‘
उसी सहजता से उसने कहा, ‘‘आप किताबें पढ़ती हुई जाती हैं, इसलिए! ‘‘
उसकी बातों से मैंने गौर किया कि इसमें कुछ तो ‘प्रतिभा‘ है जरूर ! पढ़ाई में उसकी रूचि का तो पता चल ही रहा है। मैंने पूछा , ‘‘अच्छा, तो तुम कौन-सी कक्षा में पढ़ते हो ?‘‘
उसने रूआँसु होकर कहा,‘‘ माँ जी ! मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, पर अब मेरा नाम कट चुका है! बाबू जी एक मामूली नौकरी पर थे, पिछले माह अचानक उनकी मृत्यु हो गई। मुझसे बड़े दो-भाई बहन और हैं। मैं सबसे छोटा हूं । हम सबको अब पढ़ा पाना माँ के वश में नहीं ; हम बहुत गरीब हैं। लिहाजा बड़े भैया ही पढ़ रहे हैं। हम दोनों भाई-बहन घर पर हैं। पैसों की किल्लत के कारण माँ ने मुझे साब के यहाँ नौकर रख दिया है। मैं उन्हीं के लिए दूध लेने जाता हूँ। साब बहुत अच्छे हैं ; पर उनके यहाँ मुझे खूब काम करना पड़ता है।मैं पढ़ना तो चाहता हूँ पर ..... ‘‘ रोने लगता है। मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा, ‘‘रो मत बेटे! तुम पढ़ोगे ना मैं तुम्हें पढ़ाऊँगी अच्छा, तो कल यहीं पर मिलना, ठीक दस बजे! आज मैं चलती हूँ देर हो रही हैं!‘‘
उसकी ऑंखों में चमक आ गई। खुशी से उसने कहा,‘‘सच... !?‘‘मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए हामी भरी और रिक्शे पर चल पड़ी।
अगले दिन वह मेरी बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उसे रिक्शे पर ले जाकर मैंने फिर से दाखिला करवाया। उसके रहने,खाने,पहनने,ओढने,पढ़ने,लिखने,का पूरा इंतजाम करवा दिया और मैंने शर्त रखी कि उसे हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होना होगा। उसकी मां यह जानकर फूली नहीं समाई चूंकि मैंने उसके खर्चों का सारा जिम्मा ले लिया और वह लड़का पढ़ता गया, पढ़ता गया, आगे बढ़ता गया।
जब उसने मैट्रीक पास कर १२वीं में दाखिला लिया। उसी वर्ष मेरा तबादला भुवनेश्वर से बारीपदा हो गया और देव से मेल मुलाकात भी ठीक से हो नहीं पाया। फिर भी मैं उसके कॉलेज के प्रिंसीपल जो मेरे अंतरंग मित्र थे उनकी मार्फत से पैसे भेज दिया करती थी। दो साल यूं गुजर गये।
12वीं के रिजल्ट निकलते वक्त मेरी सास की तबीयत काफी बिगड़ जाने से हमें छुट्टी लेकर उनके इलाज हेतु दिल्ली जाना पड़ा। वहां हमें दो महीने मजबूरन रूकना भी पड़ गया। इस बीच व्यस्तता इतनी अधिक बढ़ गई कि कुछ याद ही नहीं रहा। वहां से लौटे तो पता चला की 12वीं का रिजल्ट आ गया है और दाखिला लेने का समयावधि खत्म हो चुकी है। देव का क्या हुआ? उसने कहीं दाखिला लिया या नहीं? इस बीच उससे पत्राचार भी नहीं हो सका! कहां है वह ? कैसे ढूंढूं ?
उस वक्त आज के जैसे मोबाइल फोन की चलन या सुविधा नहीं थी। अंततः मैंने उसी प्रिन्सीपल के पते पर रूपये भेज दिये और संदेश में लिखा कि कम पड़े तो दे दिये रहेंगे ; मैं बाद में भेज दूँगी। उसके बाद मैं अपने कॉलेज बारीपदा चली गई थी।
परन्तु धनादेश के रूपये लौट आये और साथ में प्रिन्सीपल का एक खत भी। उसमें लिखा था कि देवव्रत ने 12 वीं की परीक्षा पच्यासी प्रतिशत अंक के साथ उत्तीर्ण कर ली है पर दाखिला लेने वह नहीं आया। उसका कोई अता-पता नहीं है!
उस दिन मैं बेहद दुःखी हुई ; गहरी उदासी छा गई थी। सोचा , कहाँ गया होगा! पैसों की कमी के कारण उसने कहीं ..........! मन में तरह-तरह के खयाल आ रहे थे। किसे पूछा जाये ; कौन बता सकता है उसके बारे में ? पिछली बार मैं उसके घर गई थी ,पर वहाँ कोई नहीं मिला और न ही अड़ोस-पड़ोस के लोग कुछ बता पाये। और कोई उपाय नजर नहीं आया ,क्या किया जाये ?
इस बीच दस साल गुजर गये हैं। मैं उसे लगभग भूल चुकी थी। आज अचानक उसका पत्र पाकर बचपन में उसके रिक्शा ढकेलने का दृश्य मेरी आँखों के सामने बार-बार नजर आ रहा था।
उसके खत से ज्ञात हुआ कि 12 वीं के बाद उसने सेट परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया था। इसी बीच अमेरिका से आये हुए पर्यटकों से उसका परिचय हो गया था और उसने उन्हें धौलगिरि तथा दयानदी के किनारे वाले कलिंग युध्द के बाद अशोक के हृदय परिवर्तन की बातें तथा अशोक के शिलालेख आदि विवरण को अच्छी तरह अंग्रेजी में समझा दिया था। जिससे वे इतने प्रभावित हुए कि उसे साथ अमेरिका ले जाने का सारा इंतजाम उन्होंने अपने स्तर पर कर दिया था। लिहाजा वह वहीं अमेरिका में है। बाकी बातें बाद में।
उस पत्र में उसका पूरा पता न होने के कारण मैं पत्राचार नहीं कर पाई थी। बहरहाल अब हम अपने नये मकान में आ गये हैं। एक रोज की बात है। मैं रसोई में खाना बना रही थी तभी इन्होंने बरामदे से चिल्लाया,‘‘ अजी सुनती हो!,आज का अखबार देखा तुमने ? क्या सुखद समाचार छपा है, यहाँ आओ तो सुनाऊँ!‘‘
मैंने अंदर से ही कहा ,‘‘ क्या समाचार है ? सुनाओ तो सही ; मैं यहीं से सुन सकती हूँ। बहरी नहीं हूँ ,समझे !‘‘
उधर से उन्होंने कहा,‘‘ अच्छा बाबा लो! तुमने जिस देवव्रत के बारे में जिक्र किया था न ,वह अमेरिका से आ रहा है !‘‘
मैं चौंके से निकली और अखबार छीनकर पढ़ने लगी। आँखों में दीख पड़ा वह समाचार।‘‘ अमेरिका के प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के न्यूलीयर फिजिस्ट प्रोफेसर डॉक्टर देवव्रत दास भुवनेश्वर में स्थित इन्सटीट्यूट ऑफ फिजिक्स में विजिटिंग प्रोफेसर बनकर आ रहे हैं.......!
मैं अपनी कल्पना में बचपन के उस देव को ढूँढ रही थी जो मेरे रिक्शे को पीछे से ढकेल दिया करता था। वक्त बदलते देर नहीं लगती । कुछ भी हो। मैंने उस समाचार को आधोप्रांत दोबारा पढ़ा और आश्चर्य मिश्रित हर्ष के साथ विभोर हो गई। मैंने कैलेण्डर में उसके आगमन की तिथि को गोला बनाकर रेखांकित कर दिया। मुझे कभी-कभी संदेह भी होता था कि क्या यह वही देव है या फिर अन्य कोई .......पिछले दस साल से मैं उसे नहीं देख पाई हूँ। उसे ढूँढने की कोशिश करती ; पर ! सच, कितना बदल गया होगा उसका चेहरा मोहरा ! कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी नाम का कोई और हो ! नहीं....... यह देव ही है, ऐसा मेरा दिल कहता। खैर जो भी हो वक्त सबकुछ सच-सच बता देगा। 16 सितम्बर का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता। मैं अपने काम में मन लगाने की कोशिश करती , लेकिन बार-बार उसकी याद हो आती ! देव के चेहरे की अलग-अलग झलक मानस पटल पर उभरती रहती। कभी हँसता मुस्कुराता मुखड़ा तो कभी गंभीर उदास गमगीन चेहरा मुझे उद्वेलित कर देता था। क्या वह मुझे पहचानेगा भी या नहीं ! उसे पहचानना मेरे लिए मुश्किल सा है। इस बीच कोई पत्राचार भी नहीं हुआ। उसके बाकी के तीन और पत्र तो मुझे मिले ही नहीं ! कहाँ खो गए पता नहीं ! काश , मिल जाते तो उसमें क्या कुछ लिखा है इसकी जानकारी मिल जाती। मुझसे कोई जवाब न पाकर हो सकता है उसका दिल टुट गया हो। पता नहीं , क्या सोचा होगा ! क्या बीती होगी उस पर ........। वैसे मैंने उसके लिए किया ही क्या है ? मजबूरी या परिस्थितिवश कुछ रूपये बस तो भेज दिया करती थी । पर उसके लिए मेरे दिल में कितनी बेचैनी है; यह कैसे बताऊँ मैं उसे । लेकिन आज अगर वह मुझे पहचानने से इंकार कर दे और कहे कि जो कुछ वह बना है। अपनी मेहनत और तकदीर से ही बना है, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है तो ......‘ नहीं ‘ ......मैं चिल्ला उठती ! पति चौंक जाते और कहते ,.. ‘‘क्या हो गया ? किन खयालों में खोई हो !‘‘ मैं सामान्य होकर संयत स्वर में कहती , ‘‘ नहीं , बस यूं ही ....‘‘
आखिरकार वह बहु प्रतीक्षित दिनाँक 16 सितम्बर आ ही गया। मन में खुशी की लहर दौड़ गयी। अखबारों के मुताबिक प्रोफेसर देवव्रत दास दिल्ली वाली फ्लाईट का समय दोपहर दो बजे है ! पर मैं काफी पहले से ही तैयार होकर एयरपोर्ट जाने का कोई बहाना और जुगाड़ ढूँढ रही थी चूँकि ऐन वक्त पर ड्रायवर भी अब तक आया नहीं है। आने की उम्मीद भी कम है। इन्हें कहूं तो भी ये बहाना बनाएंगे या फिर सवाल के ऊपर सवाल। बेहतर होगा किराये पर टैक्सी ले लूँ।
इन्हें बिना बताये किसी तरह मैं घर से निकलने को कोशिश कर ही रही थी कि उनकी आवाज आई ,‘‘ कहाँ जा रही हो , भई !?‘‘
‘‘ कहीं नहीं , बस ... यूँ ही एक सहेली से मिलकर आती हूं ,‘‘ कहकर मैं घर से निकली और रास्ते में टैक्सी किराये पर लेकर ‘एयरपोर्ट ‘ पहुंच गई।
प्लेन आने में अभी आधे घंटे और लगेंगे। मैं एयरपोर्ट के प्रतीक्षालय में बैठकर इर्द-गिर्द ताकने लगी। तभी मैंने देखा इन्स्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के डॉ सामन्त जी और कुछ अन्य व्यक्ति किसी की प्रतीक्षा में हैं।
मुझे देख डॉ नंद जी ने मेरे करीब आकर पूछा , ‘‘नमस्ते मैडम! आप और यहाँ ? कोई आने वाले हैं क्या ? ‘‘
मैंने मुस्कुराते हुए कहा , ‘‘जी हाँ, एक रिश्तेदार आने वाले हैं ! पर अपनी उत्सुकता के कारण मैंने पूछ ही लिया ,‘‘आप सब यहाँ हैं , मतलब आपके इंस्टीट्यूट में कोई आने वाले हैं क्या ?‘‘
उन्होंने मेरे समीप वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ‘‘जी हाँ मैडम ! अमेरिका के प्रिन्सटन युनिवर्सिटी से फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ देवव्रत दास जी आ रहे हैं। हमारे इंस्टीट्यूट में उनकी एक लेक्चर सीरीज रखी गई है। वे विजिटींग प्रोफेसर बनकर आ रहे हैं।‘‘
मैंने पूछा , ‘‘ उनका घर कहाँ है ? बता सकते हैं आप ? किनका सुपुत्र हैं वे ? कहाँ से पढ़ाई की उन्होंने ? क्या वे मूलतः अमेरिकी हैं या फिर भारतीय... ?‘‘
डॉ नंद जी मेरे इन सवालों के जवाब देने में असमर्थ रहे। इसके बाद कुछ और प्रसंग हुई और वे अपने साथियों के पास चले गए। मैं वही बैठी रही एक अंतर्द्वंद में झुलती हुई। स्थिति उहापोह की थी !
प्लेन लैण्ड होने की प्रारंभिक उद्घोषणा होने लगी। मेरी उत्कंठा बढ़ती जा रही थी । नियत समय पर प्लेन आ पहुँची। मेरी नजरें प्लेन के प्रवेश द्वार पर टिकी थी। बारी-बारी से सभी यात्री उतरने लगे । मेरी निगाहें देव को ढूँढ रही थी। तभी मैंने देखा कि हाथ में गुलदस्ता लिए डॉ नंद जी अपने साथियों के साथ एक ऊँचे कद वाले व्यक्ति को बारी -बारी से हाथ मिलाते हुए स्वागात-सत्कार कर रहे हैं।
सूटबूट में जकड़ा छः फूट से ऊँचा वह सौम्य व्यक्ति क्या देव हो सकता है ? मैं उस व्यक्तित्व में बचपन के उस देव को तलाशने लगी। उन सबके हाव-भाव से मैं आश्वस्त हो गई कि हो न हो यही वह देव है अर्थात् देवव्रत । मैं जानबुझकर गेट के पास खड़ी थी ; ताकि उन सबकी दृष्टि मुझ पर पड़े और मेरी उन पर ............।
तभी डॉ नंद जी आ पहुँचे और कहने लगे,‘‘मनीषा जी ! आप तो कह रही थीं आपके कोई आने वाले हैं ? आये नहीं क्या ........?‘‘
मेरे कुछ कहने से पहले ही उस आगन्तुक युवक ने मेरी ओर देखा और पलक झपकते ही मेरे पैर छूकर ‘‘माँ जी ,आप ?‘‘ कहा। उसके चेहरे पर अपूर्व भाव था और मेरे मन में गभीर संतोष ! खुशी के इस आलम में मेरे मुँह से शब्द ही न निकले। खुशी से उछलते हुए देव ने कहा ,‘‘माँ जी ! आपको कैसे पता कि मैं आ रहा हूँ ? जबकि मैं खुद आपके पास गया होता और ‘सरप्राइज ‘ देता , ऐसा सोच रहा था मैं।‘‘
फिर भी मैं चुप थी। मेरे मुँह से कुछ भी शब्द न निकला । पर मेरी आँखें भर आई । ये आंसू खुशी के थे जो छलक आये, अनायास ही हम दोनों को इसकदर देख डॉ नंद जी ने कहा ,‘‘ मनीषा जी! आपने तो हमें बताया ही नहीं कि देव जी आपके सुपुत्र हैं ? ताज्जुब की बात है !‘‘
मैं क्या कहूँ ! तभी हालत को भाँपते हुए देव ने कहा , ‘‘नंद जी ! हमारी माँ जी कभी-कभी इसी तरह चौंका देती हैं ! सच, चौंकाने में जो मजा है वह पहले से बताने में कहाँ? क्यों माँ जी ! मजा आया न नंद जी ! इस ‘सरप्राइज ‘ में ? ‘‘... और सब ठहाके लगाने लगे ; मैं भी हँसी को रोक नहीं पाई थी।
हम सब एयरपोर्ट से बाहर आ गये। देवव्रत मेरे ही साथ आने की जिद करने लगा तो नंद जी और उनके साथियों ने कहा, ‘‘ठीक है, कोई बात नही ; आप वहाँ से हो आईये; गेस्ट हाऊस में हम आपका इंतजार करेंगे।‘‘
टैक्सी में देव और मैं अपने घर की ओर चल पड़े । रास्ते भर बातें होती रही। मुझे उस दिन का वह दृश्य याद आ गया। जब मैं उसे रिक्शे पर बिठाकर दाखिला के लिए स्कूल ले जा रही थी; और आज वह एक विजिटींग प्रोफेसर की हैसियत से मेरे करीब बैठा है। सोचो तो अजीब सा लगता है, सहसा विश्वास नहीं होता । पर यह सच है, तकदीर बदलते देर नहीं लगती !
हम दोनों को इस हालत में देख पतिदेव क्या सोचेंगे? उन्हें मैं क्या जवाब दूँगी ; यही सोचती रही । इन खयालों में खोये हुए हम अपने घर आ पहुँचे । कॉलिंग बेल बजाने की आवश्यकता नहीं हुई चूँकि दरवाजा खुला था। अंदर देखती हूं तो ये गायब ! कहाँ गये ! देव अचरज भरी निगाहों से हमारे नये फ्लैट को देख रहा था। पहली बार आया था न इसलिए । उसे सोफे पर बिठाकर मैं रसोई में गई कुछ खाने पीने का इंतजाम करने । तभी देव ने कहा ,‘‘माँ जी ,‘ आप मेरे खाने को लेकर परेशान मत होईये ; मैं प्लेन में खाकर ही आया हूँ। ‘‘
तभी दहलीज पर इन्होंने दस्तक दी और कहा, ‘‘प्लेन में खा चुके हो तो क्या अपने यहाँ कुछ भी नहीं खाओगे ?‘‘
उनके पैर छूते हुए देव ने संयत स्वर में कहा,‘‘नहीं, बाबूजी ! ऐसी बात नहीं है! ‘‘
मैंने देखा तो इनके हाथों में बड़ा सा पैकेट है; जिसमें खाने की सामग्री भरी हुई है। अब दोनों गले मिल रहे थे , यह देख मुझे आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ और इस अप्रत्याषित दृश्य क्या वास्तव में सच है या मेरे मन का भ्रम ? इस सोच में मैं डूब गई थी ।
तभी इन्होंने टांट मारते हुए मुझ से कहा,‘‘तुम्हारी गतिविधि से मुझे पता चल गया था कि आज देवव्रत आ रहा है। तुमने मुझे नहीं बताया पर मुझे सबकुछ पता था पहले से ही । मैं एयरपोर्ट भी गया था। उधर से ही खाना लेकर आ रहा हूँ। घर पर नौकर था , कहाँ गया ? बुलाओ उसे और खाना लगवाओ, बड़ी जोरों की भूख लगी है! पेट में चूहे दौड़ रहे हैं ; क्यों देव ?‘‘
देव कुछ झेंप सा गया। अब डायनिंग टेबल पर प्लेटें टकराने लगी और गतियाते-बतियाते तीनों के ठहाके दूर-दूर तक सुनाई दे रहे थे।
02 : अभिनय.....(अनूदित ओड़िया कहानी )
अनिन्द्य सुंदरी है नंदिता राय जिसके अंग सौष्ठव से मंदिरों में उकेरी गयी प्रस्तर प्रतिमाएं, अभिसारिकाएं नायिकाएं जीवन्त हो उठती हैं। जिसके पैरों के घुंघरू से ही जीवन्यास मिल जाता, नृत्यकला को और जिसके संतुलित कंठ से निर्गत सुमधुर स्वर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर जाता ।
भरत मुनी के नाट्य शास्त्र में वर्णित नर्तकी का स्वरूप मानो नंदिता में कूट कूट कर भरा हो ऐसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता कि उस शास्त्र के अनुसार ही मानो उसकी रचना हुई हो अर्थात् उसकी बनावट शास्त्रानुरूप ही है।
नंदिता के मंच पर पधारते ही दर्शकों का मन खुशी और उल्लास से झूम उठता है। पलक झपकते ही उसके नृत्य से मंत्रमुग्ध दर्शक किसी भाव-लोक में खो जाते हैं।
नंदिता का परिवार कलानुरागी है। सभी उसे प्रेरित व प्रोत्साहित करते। मॉं ने अपने घर की जिम्मेदारी किसी और को हस्तांतरित कर परछाई की भांति हमेशा उसके इर्द-गिर्द बनी रहती हैं। राज्य में विशिष्ट नृत्यांगना के रूप में पहचान और गौरव हासिल के संगसंग समाज में भी उसकी साफ सुथरी छवि बनी रहे; इसके लिए उसकी मॉं हमेशा प्रयत्न करती रहती !मॉं-बाबूजी, भाई बंधु तथा शुभचिंतकों के संग संग नृत्य विशारद वर्ग भी उससे ये आशा रखते हैं कि राष्ट्रीय तथा अन्तराष्ट्रीय स्तर कभी नंदिता अपने राज्य का नाम रौशन करेगी और ओड़िशी नृत्य का प्रचार प्रसार होगा ही। औरों की अभिलाषाएं उसे उसकी नृत्य साधना हेतु प्रोत्साहित करती रही और अंग्रेजी में एम.ए. के पश्चात् अपना सारा वक्त नृत्यकला के लिये समर्पित कर पारंगत होना चाहती है वह।
एक बार इंजिनीयरिंग कॉलेज के एक समारोह में उसे नृत्य करने का आमंत्रण मिला। उस दरमियान उसका परिचय युवा इंजीनियर सुदेश से हुआ। जान-पहचान के बाद दोनों ने एक दूसरे को अपना मोबाइल नंबर दिया।फिर शुरू हुआ सामान्य वार्तालाप जाने कब घंटों में तब्दील होता गया कि यह नंदिता को पता ही नहीं चला।
सुदेश कभी उसकी खूबसुरती की तारीफ करता तो कभी उसकी नृत्यकला की। यह सिलसिला चलता ही रहा। अंत में उसने उससे विवाह का प्रस्ताव भी रख दिया।
नंदिता अब भावनाओं में बहने लगी। फिर भी वह सचेत थी कि उसकी साधना में कोई विघ्न या प्रतिबंधक उत्पन्न न हो। बचपन से अपने आप को एक विशिष्ट ओड़िशी नृत्यकारा के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु बहुत मेहनत करती आयी है जिसका कोई हिसाब नहीं है।अब जब वह अपनी मंजिल के करीब है और उसे सफलता मिलने जा रही है; तब प्रेम या विवाह के कारण उसे यह सब जैसे खोना न पड़े।
नंदिता की यह सावधानी उसे सुदेश को भूलाने हेतु उसका मनोबल बढाती। वह लाख कोशिश करती रही कि सुदेश को अपनी कमजोरी कभी न बताए।
उसे क्या करना चाहिए? कभी-कभी वह समझ नहीं पाती। किसे अपनाए?सुदेश को या फिर नृत्य साधना को? इस वक्त भावनाओं में बहना ठीक नहीं है। दिल कहता है पर अंदर से एक और आवाज आती लुभाती हुई; जीवन में नृत्यकला की भांति प्रेम भी अनमोल है।और जब स्वयं प्रेम उसकी दहलीज पर दस्तक दे रहा है तो उसकी ओर ध्यान न देना भी ठीक न होगा। क्या केवल नृत्य के सहारे ही वह जीवन में सुखी हो पायेगी भला?
उसके इंकार से सुदेश उसकी जिंदगी से चला जायेगा। आज नहीं तो कल विवाह तो उसे करना ही होगा। लेकिन उस वक्त सुदेश के जैसा उच्च शिक्षित सौम्यकान्त और खासकर इतना चाहने वाला पति हो सकता है न मिले। परंतु कला के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने का यही सुनहरा अवसर है। इसे खो दें तो साधना में पूर्ण विराम सा लग जायेगा!
नंदिता कई दिनों तक इस में उलझी रही कि वह क्या करे क्या न करे?
अंततः उसने फैसला किया कि सुदेश को वह अपने दिल की बात बता देगी। कम से कम दोस्त की तरह दोनों जुदा तो हो सकेंगे। गलत फहमियां या खुदगर्जी से इतने अच्छे सम्बंध को तोड़ देना उचित नहीं होगा।
नंदिता यह बात बताने के लिए न तो सुदेश के घर जा सकती है और न ही घर से बाहर! चूँकि इस तरह की बातचीत का रूख क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता है! वैसे भी सुदेश बहुत भावुक है। कैसी प्रतिक्रिया होगी कुछ कही नहीं जा सकती।
कई सोचने के बाद उन्होंने यह फैसला लिया है कि वह अपनी सहेली स्निग्धा के यहां सुदेश को यह सब बतायेगी।चूंकि स्निग्धा इस वक्त घर पर अकेली है; उसके माता पिता बाहर गये हुए हैं। इसके अलावा वह इन दोनों के बारे में जानती है। लिहाजा उन्होंने इन दोनों के मिलने का प्रबंध भी कर दिया।
अकेले में मिलने की ख्वाहिश सुदेश की बहुत दिनों से थी जो पूरी नहीं हो पा रही थी। आज एकाएक नंदिता की ओर से यह आमंत्रण पाकर सुदेश आश्चर्य मिश्रित हर्ष से उछल रहा था।
लेकिन वहां जाते ही नंदिता का गंभीर और उदास चेहरा देख सुदेश के इरादों पर तो पानी फिर गया।
नंदिता की सारी बातें सुदेश सुनता रहा,चुप! अंत तक नंदिता ने अपनी भावनाओं को दबाए रखा पर उसका गला भर गया था।
सुदेश ने नंदिता की ओर देखते हुए कहा, “तुम्हें जो कुछ कहना था कह दिया; अब मेरी भी सुनो। तुम जिस बात के लिये इतना चिंतित और परेशान हो उसका कारण मैं जानता हूं।चूंकि तुमने मुझे पहले नहीं कहा, मैं ने भी नहीं बताया। खैर..., कोई बात नहीं! तुम्हारी नृत्यकला से ही प्रभावित होकर मैं तुम्हारी ओर आकृष्ट हुआ हूं। मैं जानता हूं कि इस वक्त तुम नंबर वन पर हो। तुमने ये कैसे सोच लिया कि विवाह के बाद मैं तुम्हें स्टेज पर आने नहीं दूंगा? मैं भी कला का पारखी हूं। तुम्हारी प्रतिभा को भलीभांती जानता पहचानता हूं। तुम्हारा पति कहलाना मेरे लिये बड़े गौरव की बात होगी।
यह सुनते ही नंदिता सुदेश की गोद में सिर रख कर फूट फूट कर रोने लगी।
उसके सिर को सहलाते हुए सुदेश ने कहा, “पगली कहीं की! इस छोटी सी बात के लिए मुझे अपने से अलग करना चाहती हो तुम? बताओ,कहां जाता मैं तुम्हें छोड़कर? स्निग्धा सारी बातें सुन रही थी। फिर खुशी से झूमती हुई अंदर गयी और गरमागरम तीन प्याले चाय लेकर आ गई। फिर मजाक से उसने कहा, “ आज की बातचीत का रूख क्या होगा मैं भी सशंकित थी! लिहाजा, ज्यादा कुछ इंतजाम नहीं कर पाई हूं; बस, चाय पीजिए!पर कभी नहीं भुला पाओगे इस चाय को; है न?
नंदिता और सुदेश दोनों एक दूसरे को देखते हुए आश्वस्त होकर मुस्कुरा रहे थे।
इस बीच अमेरिका में होने वाले ‘भारत उत्सव में ओड़िशी नृत्य प्रदर्शन हेतु नंदिता को निमंत्रण मिला। निमंत्रण पाकर नंदिता फूली नहीं समायी। अमेरिका जाने के स्वर्णिम अवसर से रोमांचित हो पूरी तल्लीनता के साथ करने लगी नृत्य का अभ्यास।
दो माह बचे थे, अमेरिका जाने के लिए। तभी सुदेश के पिताजी विवाह का प्रस्ताव लिये उसके घर आ पहुंचे। नंदिता के घर में सबको पता था ये सब। किसी को कोई हर्ज या ऐतराज नहीं था। अच्छा खासा सौम्य लड़का, अक्ष्छी नौकरी, अच्छा खानदान इससे ज्यादा और क्या चाहिए?
फिर भी नंदिता की मॉं चाहती थी कि विवाह को कुछ माह के लिए और टाल दिया जाये। वर्ना नंदिता का अभ्यास बाधित हो सकता है।
पर सुदेश के पिताजी ने इसका सरल-सा समाधान बताया कि विवाह के दो-चार दिन बस परेशानी है; फिर जब चाहे अभ्यास किया जा सकता है। और फिर सुदेश भी दो महिने की छुट्टी लेकर नंदिता के साथ जा सकता है। इससे यह फायदा होगा कि नंदिता की मॉं को अमेरिका जाना नहीं पड़ेगा।
बात सभी को जच गई।
दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया। दाम्पत्य सुख के कुछ दिन यूं बीत गये। एकाएक नंदिता को ध्यान आया, अमेरिका जाने के लिए अब चंद ही हफ्ते बचे हैं। देखा,वहां के जैसे यहां बड़ा कमरा नहीं है। है भी तो सामान भरा पड़ा है; ले देकर बैठक में से सोफा सेट को हटाकर व्यवस्था की जा सकती है। उसने अपना आशय सुदेश से कहा। सुदेश ने टालते हुए मेहमानों के रहने बैठने का बहाना बना दिया। हफ्ता भर और बीत गया। इस बीच कोई व्यवस्था न हो पाने से खिन्न नंदिता को बड़ी निराशा और हैरानी हुई।
समय सरक रहा था। अपने आप को साबित करना स्वयं की जिम्मेदारी है,न कि सुदेश की। उसने अपना अभ्यास प्रारंभ कर दिया। यह देख उसकी सास दौड़ती आ गई। उसने हाथ मटका कर कहा, ‘‘हाय,राम! ये तू क्या कर रही है? माह भर भी नहीं हुए बहू बने और तू घुंघरू बांध कर नाचने लग गई। अरे अड़ोस-पड़ोस के लोग क्या कहेंगे? तुझे मटकने का अगर इतना शौक था, तो तुमने ब्याह क्यों किया?उतर आई न अपनी औकात पर....? तू क्या सोचती है, मेरे लड़के को तेरे सिवा और कोई लड़की नहीं मिलती? हाय राम, मैं क्या करूं?
सास के मुख से ऐसा अनमोल मंतव्य सूनकर नंदिता स्तब्ध हो गई। तो क्या सुदेश ने अपनी मॉं को इस बारे में कुछ नहीं बताया?पर उनके पिताजी तो खुद गये थे नंदिता के यहां। उस वक्त तो उन्होंने उसे नृत्य साधना में साथ देने की बात कही थी। और आज....? यह रवैया?!
उसने बेसब्री से सुदेश का इंतजार किया। सुदेश के लौटने पर उसने सारी बात कह दी। सोचा था, सुदेश अपनी मॉं को कुछ समझा देंगे। पर हुआ उल्टा ही। उसने नंदिता पर भड़कते हुए कहा, ‘‘ तो क्या तुम ये समझती हो कि मैं अपनी मॉं को फांसी पर लटका दूं?
नंदिता यह सुन दंग रह गयी। उसे सुदेश से ऐसी उम्मीद नहीं थी।
उसकी समझ में नहीं आया कि सुदेश की नाराजगी के पीछे क्या कारण है? फिर भी उसने विनम्र होकर कहा, ‘‘सुदेश! तुम्हें पता है कि ‘भारत उत्सव’ होने में चंद हफ्ते ही बचे हैं। मेरा अभ्यास करना बहुत जरूरी है। और फिर तुम्हारे पिताजी ने भी तो सहयोग करने का पूरा आश्वासन दिया था। फिर ये कोताही क्यों?
उसने फूट फूट कर रोना शुरू कर दिया।
सुदेश ने रूख बदलते हुए कहा, ‘‘उस वक्त पिताजी ने क्या कुछ कहा; उस पर तुमने विश्वास कर लिया?
लेकिन तुमने भी तो वादा किया था; वचन दिया था मुझे क्या आपको भी मैं विश्वास न करूं?
नंदिता के सवाल का कुछ भी जवाब दिये बिना ही सुदेश वहां से चला गया था।
तब से नंदिता की आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी थी । उसे याद आने लगी सुदेश की कही बातें!
‘‘नंदिता ! रात के किसी भी वक्त तुम्हारे कंठ से कोई सुमधुर स्वर गुंजने लगे तो मैं ही हूंगा तुम्हारा पहला श्रोता । नृत्यरत तुम्हारे क्लांत पैरों में मैं भर दूंगा नई उर्जा । घर की सभी जिम्मेदारी होगी मुझ पर और तुम होगी अपनी साधना में लीन।
उसने सोचा; विवाह पूर्व के सुदेश और अब के सुदेश में कितना अंतर आ गया है ? उसने उसके साथ ऐसा धोखा क्यों किया ? क्या वो उसे किसी भी शर्त पर पाना चाहता था? ....... आदि आदि .!
सुदेश ने बिस्तर पर इत्मीनान से गहरी नींद ले रहा था। नंदिता अपनी छलछलाती आंखों से उसे घूर रही थी। उस वक्त उसे सुदेश का एक घिनौना रूप नजर आ रहा था।
छले जाने के कारण नंदिता अंदर से कांप गई थी! सोच रही थी कि अपने मॉं-बाबूजी को वह सारी बातें बता देगी।लेकिन उसने तो स्वयं सुदेश को चुना और शादी के लिए पहल की। उसने कहा था कि सुदेश उसकी कला का सच्चा प्रशंसक है और प्रेमी भी। अब वह किस मुंह से कहे कि सुदेश अब वैसा नहीं रह गया है?!
नंदिता को अपने ससुर जी की बातें याद आई तो थोड़ा आश्वस्त होकर सुबह की प्रतीक्षा में किसी तरह रात बिताई उसने।
सुबह उठने में उसे जरा देर हो गई। सुदेश कहीं बाहर जा चुका था। नंदिता यथाशीघ्र नहा धोकर पूजा कक्ष में प्रविष्ट हो जगन्नाथजी की अराधना में लीन हो गई। यह उसकी नियमित दिनचर्या है। क्रमशः उसकी अस्थिरता कम होने लगी थी।
पूजाकक्ष से निकलते ही उसने देखा कि ससुरजी उसके समक्ष खड़े हुए हैं और उसके कुछ समझने से पहले ही झोली फैला कर उन्होंने कहा, “बेटी! आज मैं तुमसे कुछ मांगना चाहता हूं; निराश तो नहीं करोगी?
‘‘ बताईये बाबूजी! क्या है?" साश्चर्य उन्होंने कहा।
-तुम्हें वचन देना होगा पहले!
नंदिता सशंकित हो गई! क्या यह वही पिताजी हैं जो, उसका हाथ मांगते वक्त नृत्यकला में प्रतिबंधक न होने की बात कह रहे थे और आज.........
सुदेश के पिताजी ने बिना देर किये कह डाला,- ‘‘तुम्हें वचन देना होगा बेटी, कि आज के बाद तुम फिर कभी, कहीं नहीं नाचोगी!
“पिताजी!! सर्पदंश की भांति चौंक गई नंदिता । किसी तरह अपने आप को संभालते हुए उसने कहा, ‘‘लेकिन बाबुजी ! आपने तो कहा था........’’ उसे कुछ कहने नहीं दिया और स्वयं कहा, ‘‘मेरा बेटा तुमसे शादी करना चाहता था। उसकी खातिर ही मुझे ऐसा ‘अभिनय’ करना पड़ा था।
‘‘बाबुजी! तो क्या मेरे अरमानों का कोई अर्थ नहीं रह गया?
तेरे अरमान अब आये कहां से?शादी के बाद तो पति और सास ससुर के अरमान ही रह जाते हैं । इन्हें मानना तुम्हारा धर्म है और कर्तव्य भी। इसके अलावा तुम मुझे वचन दे चुकी हो; समझी!
नंदिता के मुंह खुले के खुले रह गये । वह अवाक हो गई। वचन कौन किसे दिया था? अपनी इच्छा पूर्ती के लिए बाप बेटे ने मिलकर क्या खूब जीवन्त अभिनय कर डाला! वह तो केवल मंच पर किसी भी गीत-संगीत की धुन में नाचती-थिरकती रही और दर्शकों मंत्रमुग्ध करती रही अपनी नृत्य कला से । लेकिन इन्होंने तो मंच के पीछे कितना अच्छा ‘अभिनय’ करके किसी की साधना, संभावना और अरमानों का गला घोंट डाला है!
नंदिता सोच रही थी....इस छल अभिनय में यदि वह भी मंगलसूत्र और मांग में भरे सिंदूर की परवाह न करे और उसे तोड़कर व मांग को साबून से धोकर फिर साफ कर ले तो....?
और अगर इसकी परवाह करती है तो संगीत जो उसकी धड़कन है वह रूक जायेगी और निस्पंद हो बन जायेगी वह मूक। नृत्य जो उसकी गति है इसके बिना वह तो पंगू हो जायेगी और कला तो उसकी जीवनशक्ति है अर्थात् सब कुछ समाप्त सा हो जाएगा।
तो क्या अपनी मांग को सिर्फ रंगने के लिये ही वह एक मूक, पंगू और अथर्व-सी जिन्दा लाश बनकर जी पायेगी?
उसकी चूप्पी का पल गुजर जाये इस अपेक्षा में छलछलाते आंसू के साथ उसके सम्मुख खड़े थे अभिनय में पारंगत उनके ससुरजी!
03 : जूही का गजरा..... (अनूदित ओड़िया कहानी)
गर्मी छुट्टी में मैं बेटे के पास मुम्बई जा रही थी। कुछ दिन इत्मीनान से बीताने की योजना बनने से यहां के सारे काम काज निबटा कर जाने की तैयारी में ट्रेन पकड़ते तक का समय बड़ी ही व्यस्तता में कट गया। कोणार्क ट्रेन भुवनेश्वर से दोपहर करीब दो बजे। एयर कन्डीशन कम्पार्टमेन्ट की प्रथम श्रेणी बोगी वाली चार बर्थ में से मेरी बर्थ थी सबसे ऊपर। मैं सामान नीचे जमाकर ऊपर वाली बर्थ में चढ़ गई। मुझे बेहद थकावट लग रही थी। अतः पत्रिका में नजर दौड़ाते-दौड़ाते मुझे जाने कब नींद लग गई कि मुझे पता ही नहीं चला।
कुछ लोगों के आने जाने और सामान आदि रखने की आवाज से मेरी नींद खुल गई। देखा तो गाड़ी ब्रम्हपुर स्टेशन पर खड़ी है। मेरे सामने वाली नीचे बर्थ में थी एक मध्यम उम्र की प्रौढ़ महिला और मध्यम उम्र के ही एक प्रौढ़ पुरूष। कुछ सामान आदि सीट के नीचे रख रहे थे वे। मैं जागकर उठी व नीचे जाने को उद्यत हो रही थी कि एकाएक महकने लगी जूही की खुशबू। मैं इर्द-गिर्द निहारा तो पच्चीस छब्बीस वर्षीया एक नवविवाहिता लड़की उस महिला के करीब आकर बैठ गई। लड़की का रंग था अमूमन साफ। उसने पहन रखी थी एक गाढ़ी बैगनी रंग की जरी के किनारे वाली सिल्क साड़ी। प्रसाघन कुछ ज्यादा ही मालूम पड़ रहा था। उसकी ऑंखों में गाढ़े काजल की रेखा, माथे पर बड़ी सी कुंकुम की बिन्दी, मांग में गाढ़े लाल सिंदूर, लिपिस्टिक लगे अधर और पर्याप्त गहनों से सुसज्जित उसका मुखड़ा ;रूपद्ध देखने में बुरा नहीं लगता था। बल्कि उसे अच्छी तरह या गौर से देखने की इच्छा होती थी। अपनी लम्बी चोटी पर या जूडे़ पर कहीं उसने पहन रखा था ताजी जूही का एक गजरा।
ट्रेन चलने को उद्यत हो रही थी।
मैं बर्थ से नीचे उतर आई। उनके सामने वाली बर्थ की ओर वह सभ्य पुरूष गुमसुम बैठे थे। मैं जरा फासला रख, दूर खिसक कर बैठ गई। अचानक उस लड़की ने अपनी सीट से खड़ी हो सिर झूकाते हुए कहा,- ‘‘नमस्ते मैडम!"
मैं उसे पहचान नहीं पायी। पहचानने की कोशिश कर रही थी।
उसने कहा, - ‘‘आपने मुझे पहचान नहीं पाया न मैडम! मैं शर्मिष्ठा सामन्तराय हूं। आप ब्रम्हपुर वीमेन्स कॉलेज में थीं तब मैं पढ़ती थी।"
मैं मानो पहचान गई हूं ऐसे दिखावे से बोली, ‘‘अच्छा-अच्छा! अब क्या कर रही हो?"
उसने मेरे सवाल का जवाब दिये बगैर कहा,-‘‘मैडम यह मेरे माता पिता हैं।"मैं उन्हें नमस्ते करते वक्त उसने अपने माता-पिता को ध्यान दिलाते हुए कहा, ‘‘ये हैं अरूणा मैडम! मेरे कॉलेज के पढ़ते समय मैडम हमें भाषा - साहित्य पढ़ाती थी। मॉं! मैंने तुम्हें मैडम के बारे में कई बार बताया था। तुम्हें याद है?" सभ्य महिला ने अकचकाकर कहा, ‘‘हॉं.... हॉं.... हॉं.... याद आई! तुम्हारे कॉलेज के ड्रामा के समय शायद मैडम के बारे में अक्सर बताती थी।"
अनायास मुझे स्मरण हो आया, उस लड़की के बारे में। मैंने पूछा,- ‘‘अच्छा शर्मिष्ठा ! तुम ‘उषा-अनिरूद्ध’ डांस ड्रामे में चित्रलेखा बनी थी न!"
‘‘हॉं मैडम ! अब आपको मेरी बात याद आई।"
‘‘हॉं, उस वक्त के चेहरे और अभी के वघु-वेश में काफी फर्क है! इसके अलावा, सात-आठ साल पहले की बात है न?" मैंने थोड़ा हॅंसते हुए कहा।
शर्मिष्ठा मेरी बातों से उत्साहित होकर बोली, ‘‘मैडम! आपको याद है; शकुंतला की बातें? कितनी डांट-फटकार सुनती थी वह आपसे।"
मुझे हॅंसी आयी। अध्यापन जीवन में कभी-कभी ऐसी घटनायें भी हो जाती है। बच्चे जितना स्नेह पाते हैं; फटकार भी तदनुरूप। फिर भी खास करके शकुंतला प्रसंग मुझे याद नहीं था। सिर्फ दो-साल के लिये मैं आयी थी ब्रम्हपुर। महिला कॉलेज की नाट्य संसद की जिम्मेदारी मुझ पर थी तो वार्षिकोत्सव हेतु बच्चों को लेकर तरह-तरह के मनोरंजन कार्यक्रम प्रस्तुत करने पड़ते थे। जाने क्या कुछ हुआ होगा उस वक्त ; हो सकता है गुस्सा आया हो किसी बात पर। वह सब क्या अब याद है?"
ये सब बातें मुझे याद नहीं आ रही होगी जानकर अंदाजा लगाते हुये उसने कहा, - ‘‘मैंडम ! शकुंतला तेलगु लड़की थी। वह अच्छा नृत्य कर लेती थी तो आपने उसे शिवजी का रोल दे दिया था ; पर एक भी डायलॉग ;संवाद वह बोल नहीं पा रही थी। एक ;दृष्य (सीन) था! वाणासुर के पास शिवजी को छद्मवेष में पहुंचने होंगे। वाणासुर जब पूछेगा, ‘‘तू कौन है रे?" तो शिवजी को अपना परिचय देना होगा ; पर इतनी अभ्यास करने पर भी ऐन वक्त पर वाणासुर के प्रश्न पर शकुंतला बोल पड़ती थी, ‘‘मैं शिबू रे !" तो सभी हॅंस हॅंस कर लोटपोट हो जाते थे और आपको बहुत गुस्सा आता था, उस पर। आखरी में उसके लिये बैकग्राउण्ड से बुलवाया गया फिर भी बात नहीं बनी।" ये संबाद बोलते समय शर्मिष्ठा को बेहद हॅंसी आती थी।
मुझे शर्मिष्ठा की बात पर हॅंसी आयी। सोचा कॉलेज के दिनों में ऐसी साधारण-सी घटनायें भी किसी-किसी बच्चों के दिमाग में बैठ जाती है। ऐसा न होता तो उस लड़की की शादी हुई है, वह अपने ससुराल जा रही है। इस बात की परवाह किये बगैर वह छात्रा जीवन की पुरानी मैडम को देख कॉलेज के दिनों को याद कर खुश क्यों होती !
लेकिन एक बात मुझे अटपटी सी लगती है, उसके माता-पिता को देखकर क्योंकि उनकी बेटी की बातों का या फिर हॅंसी का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। वे अत्यन्त चिन्तित तथा विषण्ण मालूम पड़ते थे। वजह के बारे में अंदाजा लगाना मेरे लिये संभव नहीं था, और न ही जरूरी था मेरे लिये। पर वे संदिग्ध अवस्था में जिन अचरज भरी निगाहों से अपनी बेटी को बीच-बीच में निहारते थे तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता था।
कुछ देर बाद शर्मिष्ठा ऊपर वाली बर्थ में चली गई, सोने के लिये। मैं चूंकि दो-तीन घंटे में सो चुकी थी तो मुझे कोई थकावट नहीं लग रही थी। सो मैं अपने साथ ले गई एक नॉवेल निकाल कर पढने लगी।
अचानक मुझे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। मैंने किताब में से नजरें उठाकर निहारा तो देखा, शर्मिष्ठा के माता-पिता मेरे सामने वाली बर्थ पर सटकर बैठते हुए दबी हुई आवाजों में बातें कर रहे थे और वह सभ्य महिला अपने भावावेष को रोकने का प्रयास कर रही थी। मैंने अपनी नजरें किताब पर लौटायी। किसी की कोई व्यक्तिगत समस्या रही होगी, कौन जाने!
कुछ देर पश्चात मैंने देखा तो सुना उस सभ्य महिला ने दबी हुई आवाज से मुझे अपने पास बुला रही है। मैं किताब रखकर उनके पास चली गई। वह सभ्य पुरूष मेरी सीट पर आ गये।
उस महिला ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैडम! शर्मिष्ठा को आपके साथ इतनी अंतरंगता से बातें करते देख आपको एक बात कहने की हिम्मत कर रही हूँ!"
‘‘कहिये, क्या बात है?"
‘‘हम लोग शर्मिष्ठा के बारे में कुछ समझ नहीं पा रहे हैं!"
‘‘क्यों? क्या हुआ उसे? वह तो आप लोगों के साथ अपने ससुराल जाने के कारण वह बेहद खुश है!"
‘‘नहीं मैडम, वह बिल्कुल खुश नहीं है। ट्रेन पर चढ़ते तक उसने रो-धोकर स्थिति गंभीर बना दिया था।"
‘‘क्यों? क्या वह अपने ससुराल जाना नहीं चाहती?"
‘‘नहीं, ये बात नहीं हैं। हमें आज ही दामाद के एक दोस्त के जरिये सूचना मिली है कि दामाद की दुर्घटना हो गई है। स्थिति बेहद नाजूक बताई जाती है। यह खबर मिलने के बाद से शर्मिष्ठा ने रो-रोकर मुंह में पानी तक नहीं डाला है। कुछ भी हो हमें ट्रेन की टिकटें मिल गई ; सो जा रहे हैं। पर ट्रेन पकड़ने के बाद से ही शर्मिष्ठा अस्वाभाविक रूप से असामान्य सी हरकतें करने लगी है। आपके साथ हॅंस-हॅंस कर बातें की उसने; कहीं उसका दिमाग फिर तो नहीं गया है?"
ये बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। पूरी बात समझाने के लिये उसकी मॉं ने विस्तार से बताया कि शर्मिष्ठा अपनी मर्जी से प्रेम विवाह किया है। वे ओड़िया नहीं, तेलगू हैं। इसलिये लड़की वालों ने जैसा विरोध जताया, लड़के वाले भी वैसे ही आक्रामक रूप अपनाये। दोनों परिवारों की मर्जी के बगैर शर्मिष्ठा का वैंकटेश के संग विवाह हो गया। पर वैंकटेश के परिवार वालों ने शर्मिष्ठा को कतई स्वीकार नहीं किया। उनके परिवार के रीति-रिवाज, खानपान के साथ शर्मिष्ठा की लाख कोशिश के बावजूद भी वह अपने आप को वहॉं व्यवस्थित नहीं कर पायी। हमेशा सास-ससूर के ताने व डांट फटकार सुन-सुन कर बेचारी जितना दुःख कष्ट पर भी वह अपनों को भी बता नहीं पाती। चूंकि वह जानती थी कि उसके माता-पिता भी उसके इस विवाह के फैसले से खुश नहीं थे।
मैं उनकी बातें सुन रही थी। सोच रही थी कि इस मामले में घर वाले असंतुष्ट होते ही हैं और शादी के बाद वही मॉं-बाप उसी बात को लेकर बच्चों की जिन्दगी नर्क बना डालते हैं ; जाने क्यों? इससे उन्हें क्या मिलता है?
मेरा ध्यान भटकते देख कर शर्मिष्ठा की मॉं ने कहा, ‘‘मैडम! शर्मिष्ठा के न कहने पर भी हम उसका हाल समझते हैं। लड़की वाले हैं; दिल नहीं मानता। चार महीनें पहले ही हैदराबाद उनके घर हम गये हुए थे। हमे देखते ही उसके सास-ससुर ऐसे मुंह-भौं सिकोड़ने लगे और चिड़चिड़ाने लगे कि क्या बतायें? फिर भी बेटी के पास गये हुए थे, क्या करते? आप यकीन नहीं करेंगी, बेटी ने हमारे लिए कुछ खाने का इंतजाम किया था; मजबूर होकर ही हमने उस पर हाथ रखा ही था कि उसकी सास ने टॉंट मारते हुये कहा था, ‘‘तुम लोग तो अपनी बेटी के यहॉं जल भी स्पर्श नहीं करते हो न? खाना खाने कैसे बैठ गये?" शर्मिष्ठा के पिताजी उसी वक्त ही खड़े हो गये। बोले, ‘‘आपके यहां हम लोग खाने के लिये नहीं आये हैं। बेटी को कुछ दिनों के लिये हमारे साथ ले जाने के लिये लिवाने आये हैं, आप यदि कहती हैं तो.....’’
उनकी बात पूरी न होने से पहले ही दामाद के मॉं-बाप दोनों ने तमतमाते हुए कहा, ‘‘कुछ दिनों के लिये ही क्यों? हमेशा के लिये ले जाओ! यहॉं आने की कोई जरूरत नहीं है।"
मैंने पूछा, ‘‘अच्छा, आपके दामाद ने क्या कहा?"
‘‘उसकी बातें मत पूछिये मैडम , वहीं बैठा सब सुन रहा था, पर कुछ नहीं कहा उसने। हम आखिरकार लौट आये पर वह वहीं वैसे ही चुप बैठा रहा।"
अचानक उन्हें याद हो आयी दामाद के एक्सीडेंट की बात। उन्होंने तड़पते हुये कहा, ‘‘मैडम, भगवान करे वह अच्छा हो जाये, उसे कुछ न हो।" वह बारंबार हाथ जोड़कर शून्य में प्रणाम करती थी। शर्मिष्ठा के पिताजी काठ के उल्लू की भॉंति बैठे थे। वाकई बड़ी गंभीर समस्या थी। किसे क्या कहूँ? समझ में नहीं आ रहा था। शर्मिष्ठा बारे में सोचकर परेशान होती थी। उसके वार्तालाप एवं हावभाव मुझे पहले स्वाभाविक लगते थे ; अब अजीब से लगने लगे। पति की दुर्घटना पर शर्मिष्ठा पहले रोती थी, पर इतने अल्प समय में वह इतनी सहज व स्वाभाविक कैसे हो गयी? उसका सिर कहीं फिर तो नहीं गया!
मैंने मन को तसल्ली देने हेतु शर्मिष्ठा की मॉं से कहा, ‘‘इस हालत में आपने दामाद के मॉं-बाप से कुछ बातचीत नहीं की? वास्तव में वस्तु स्थिति क्या है; जान सकते थे।"
अब तक चुप बैठे शर्मिष्ठा के पिताजी ने जुबान खोली, ‘‘वे लोग इन्सान नहीं हैं मैडम! मैंने खबर पाकर दामाद के पिताजी को फोन किया था, वे मेरी आवाज सुनते ही उधर से बोले, - ‘‘क्या! चार महीने में जी भर गया? बेटी को लेकर यहॉं आने की सोचना भूल जाओ। हम अपने बेटे की खबर रख लेंगे।" बताईये मैडम, इस हालत में भी वे लोग कितने पत्थर दिल हैं, पति की ऐसी हालत में भी उसकी पत्नि को उन लोगों ने खबर तक नहीं भिजवायी। ऐसे लोगों के यहॉं हम कभी भी अपनी बेटी को भेजे न होते। पर क्या करते? उसके पति की ऐसी नाजूक हालत में उसे वहॉं न ले जाकर कोई चारा भी तो नहीं है। मजबूरन ही वहॉं जाना होगा वरना हमें कैसे पता चलेगा कि दामाद कंहा कैसे हैं?"
मैंने उन्हें सांत्वना भरे दो-शब्द कहे। मेरा मन भी बहुत दुखी व गमगीन हो गया था। मैं ऊपर बर्थ में जाकर लेटी-लेटी उस लड़की के चेहरे को देख रही थी। अहा, बेचारी की किस्मत में न जाने क्या लिखा है? कितनी निश्चिन्त हो वह सोयी है बेचारी।
सुबह हुई। मैंने देखा, शर्मिष्ठा अपनी बर्थ से उतर कर टॉयलेट (बाथरुम) गई। उसकी मॉं ने मुझे जागती देख नीचे खड़ी हो मुझसे करुण भाव से आर्तचित्त हो पूछा,
‘‘मैडम, शर्मिष्ठा को देखा न आपने?’’
‘‘हॉं, देखा।’’
‘‘उसकी मांग का सिंदूर लाल तो दीख रहा है न?’’
‘‘अरे, आप क्या कह रही है? सिन्दूर लाल नहीं दिखेगा तो और कैसे दिखेगा?"
‘‘सच कह रही हैं आप? और उसके जूही का गजरा आपको तरोताजा तो दीख रहा है न?’’
एयर कंडीशन कम्पार्टमेन्ट मे जूही का गजरा तरोताजा रहना चाहिये। पर उसकी मॉं को यह साधारण सी बात समझाने के बजाय जूही के गजरे का तरोताजा होने के बारे में मेरा स्पष्ट कथन ही उन्हें तसल्ली या दिलासा दे सकता है; यह मैं समझ गयी थी। चूंकि शर्मिष्ठा की मॉं की ऑंखें रात भर उनींदि रही हैं। उस पलकें न झपकने वाली ऑंखो में बेटी की फूटी तकदीर की तस्वीर ही लिखी हो। वह शायद दामाद के हादसे के अंजाम के बारे में अंदाजा लगाकर दृढ़ निश्चय कर चुकीं थीं।
शर्मिष्ठा काफी देर के बाद टॉयलेट से लौटी। वह फिर से अपने प्रसाधन से सज सवंरकर आयी थी। बर्थ में अब की बार वह चुपचाप बैठी रही। उसके मॉं-बाप बेहद परेशान मालूम पड़ते थे।
हैदराबाद अब बस कुछ ही देर में आने वाला है। मेरा अन्तस ;अंतर्मनद्ध एक अप्रत्याशित आशंका से कॉंपने लगा था। लड़की के नसीब में जाने क्या लिखा है? कौन सी खबर स्टेशन पर उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी? कौन जानता है?
आखिरकार दिन के दस बजे गाड़ी हैदराबाद स्टेशन पर पहूँच गयी। वे तीनों ही चुपचाप गाड़ी से उतर गये। मैं खिड़की के शीशे में से बाहर नजरें दौड़ा रही थी। कुछ दिखाई नहीं देती थी। कोई दिखते न थे। अचानक ध्यान आया कोई एक व्यक्ति प्लेटफार्म पर रो रहा था।
घटना को लेकर मेरे मन में फिर कोई संदेह नहीं रहा अर्थात् मुझे यकीन सा हो गया कि वस्तु स्थिति क्या है? मैं समझ गयी थी कि शर्मिष्ठा के पति अब नहीं रहे। इसलिये इन्हें देख सूचना देने हेतु वैंकटेश का कोई दोस्त या रिश्तेदार अपनी भावनाओं को काबू न कर पाते हुये ऐसे ऊंचे स्वर में रो रहा होगा।
मेरी ऑंखों से धार बनकर ऑंसू बहने लगे। पार्श्वस्थ बर्थ में कोई नहीं थे; अतः मैं खुद को संयत करने की जरूरत महसूस नहीं कर रही थी। खिड़की से दृष्टि लौटाकर सोचने लगी; कोई आवश्यकता नहीं है अब शर्मिष्ठा को और देखने की। उसकी काजल लगी ऑंखों की पलकें, सिंदूर भरी मांग और घनी जुल्फों में जूही के गजरे याद आते ही मैं अत्यंत मर्माहत हुई थी। मन ही मन कहती थी, हे भगवान! इस छोटी सी बच्ची को क्यों ऐसी सजा दी तुमने? बेचारी ने अपना जीवन अभी प्रारंभ ही नहीं किया था और उसका जीवन समाप्त कर दिया तुमने! कितने सपने संजोये होंगे उन्होंने अपने पति को लेकर ...... क्या टूट पडा़ उस बेचारी पर? सारे सपने, सारी तमन्नाएं टूट कर बिखर गई।
मैं अनमनी सी हो गई थी। अचानक जूही की खुशबू से महकने लगा मेरा इर्द-गिर्द व समग्र वातावरण ही । मैंने देखा तो शर्मिष्ठा एक युवक को साथ मे लेकर मेरी सीट के करीब खड़ी है। मुझे देखते ही उन्होंने कहा, ‘‘ मैडम! यह मेरे पति वैंकटेश हैं। मेरी माँ रात में आपको क्या कुछ कह रही थी; मैंने सब सुना है। आपको तो सब कुछ मालूम ही है। पर आपको शायद नहीं पता कि मेरे ससुर जी से अपमानित होकर लौटे मेरे मॉं-बाप ने कसम खा रखी थी कि मुझे अब कभी भी इनके यहॉं भेजने नहीं देंगे। देखिये तो सहीं ;भला , बड़ों के ‘इगो-प्रॉब्लम’ ;अर्थात् अहम् टकराने के कारण हम क्यों दुख उठाते या कष्ट झेलते? इन चार महीनों में इन्होंने स्वतंत्र व्यवस्था कर ली है, हम दोनों के रहने की।’’
‘‘उनके माता-पिता ने मुझे अपने घर में न घुसने देने की कसम खा रखी है, खाने दो। मेरे माता-पिता ने मुझे न पहूँचाने का प्रण किया था, तो हमने ऐसा बहाना न बनाया होता तो कभी भी एक साथ नहीं हो सकते थे। उनकी दुर्घटना की बात बताने के लिये मैं विवश हुई थी। बहुत अटपटा लग रहा है पर प्रभु जगन्नाथ जी हमें क्षमा करेंगे। .....तो फिर हम आते हैं मैडम!"
उन दोनों ने झुक कर मेरे पॉंव छूकर प्रणाम किये और जल्दबाजी में हड़बड़ी से उतर गये। मैं उनके फिर लौटने की प्रतीक्षा करती रही; मेरे अंतःकरण से स्वतः ही एक आशीर्वचन निकलने लगा, ‘‘तेरे पति को ईश्वर लंबी उम्र दें, तुम दोनों सकुशल सदा सुखी रहो!"
इस बीच ट्रेन न जाने कितने स्टेशन पार कर चुकी थी पर मेरे अंदर और बाहर चारों ओर जूही की खुशबू ही खुशबू छायी हुई थी....!