साथ न सही पल भर को मिला यूँ किसी का प्यार अजनबी !
शुक्र है खुदा का जो मुझको मिली मुहब्बत अपार अजनबी !!
बड़ा खुशनसीब समझता हूँ इस जहाँ मैं अपने आपको !
शुभान अल्लाह जो मुझको मिली खूबसूरत यार अजनबी !!
उनकी खूबसूरती का कौन दीवाना नहीं था पूरे कॉलेज में !
वो तो थी मानो जैसे सौ-बिमारों के लिए एक अनार अजनबी !!
कॉलेज का वो पहला दिन याद है मुझे आज भी अच्छी तरह !
जिन्दगी में पहली बार हुई थी उनके आँखें चार अजनबी !!
उनकी सुन्दर झील-सी आँखें देख पल भर को खो-सा गया !
दिल ही दिल में यूँ दे दिया दिल जैसे हुआ दिदार अजनबी !!
कँप कँपा रहे थे होंठ मेरे, धड़क रहा था दिल धक् धक् !
अपने प्यार का करना चाहा जिस दिन इजहार अजनबी !!
बड़ा ही शुभ दिन था वो जब मिला मुझे उनका पहला खत !
जिसमें किया था खुशी से उन्होंने प्यार का इकरार अजनबी !!
खुशी से मैं फूला नहीं समाया कदम न पड़ते जमीं पर थे !
सूने जीवन में मेरे जब वो आए बनके बहार अजनबी !!
उनकी गहरी झील-सी आँखों में नैया उतारी थी मैंने दिल की !
ज्यों ज्यों गहराया प्यार हमारा हुए उनपे निसार अजनबी !!
बेहद खूबसूरत थी तनसे वो मन से तो और भी भावुक !
उनकी जुल्फों से खेलने का मुझे मिला था अधिकार अजनबी !!
एहसासे जन्नत होता था जब जब लिपटती मेरी बाहों में !
गर्म साँसों के बीच दोनों की होता उनका रूखसार अजनबी !!
मेरी कविताओं की करके प्रशंसा लिखने की दी प्रेरणा मुझे !
जन्मदिन में दिया था उन्होंने कलम का उपहार अजनबी !!
मुझसे मिलने आई थी सहेली के संग जब चढ़ा बुखार था !
कैसे भूलूँगा मैं तुम्ही बताओ उनका ये उपकार अजनबी !!
उनसे बंधी थी उम्मीद जीने की लाखों अरमाँ थे दिल में मेरे !
उनके बिना यूँ सूना-सा लगता दुनिया का बाजार अजनबी !!
दिल के दिये हैं जलते आँसू बहते खुशबू आती है वफा की !
उनकी यादों में यूँ आवाद है मुहब्बत का मजार अजनबी !!
इस जनम में मैं उन्हें पा न सका यह मेरी बदनसीबी है !
अगले जनम तक करूँगा मैं उनका इंतजार अजनबी !!
शाहाजहाँ ने बनवाया था मुमताज की याद में ताजमहल !
उनकी यादों में यूँ बना रहा हूँ शब्दों की मैं मीनार अजनबी !!
अपने खून से लिखे थे हम दोनों ने कभी एक दुजे को खत !
अपनी मुहब्बत की दास्तान तो है एक यादगार अजनबी !!