Thursday, July 8, 2010

76.इतिहास अजनबी !

जिन्दगी रह गई बनकर इक प्यास अजनबी !
तभी तो मैं जीवन से हुआ ऐसे उदास अजनबी !!
किसी के आने से कभी आई बहार थी जिन्दगी में !
जिसके बिना बना जीवन बदहवास अजनबी !!
यादें यादें और सिर्फ यादें ही तो बाकी है जीवन में !
यादों के सिवा कुछ भी तो नहीं मेरे पास अजनबी !!
निगाहों ने गवांया उन्हें पाया था जिसे कभी दिल ने !
आज भी लगता है जैसे हो उसकी तलाश अजनबी !!
दिल से चाहा मैने जिसे पा न सका उन्हें जीवन में !
अफसोस बनकर रहा मेरा इतिहास अजनबी !!
खून से लिखे खत का उन्होंनें दिया जवाब था खून से !
मुझको आज भी होता है प्यार का अहसास अजनबी !!
उनके आने से आ जाती फिर से बहार जीवन में !
राहें जिन्दगी में ’गर मिल जाती वो काश अजनबी !!
ये दुनिया ये महफिल क्यों लगती मुझे विरान-सी !
उनके बगैर जैसे मैं इक जिन्दा लाश अजनबी !!
भूल कर भी न प्यार करना ऐ दुनियावालों कभी !
प्यार से सजता जीवन या होता सर्वनाश अजनबी !!
बीते दिनों की यादों में लिख रहा हूँ कविता आंसूओ से !
इस कदर मिटा रहा दिल का भड़ास अजनबी !!

No comments:

Post a Comment