गुजर गये वो आज मेरे दिल के करीब से !
कुछ न कह सका आज मैं अपने हबीब से !!
मांग था जिसे यूँ मैने रब से फरियाद कर !
मांग न सका मैं वो प्यार की जिन्दगी नसीब से !!
बेटी थी वो बडे घर की पर प्यार मुझे दिया !
काबिल समझा दिल लगाया इस गरीब से !!
कह न सका दिल तड़पते हुए अलविदा !
क्यों मिलाया उन्हें रब ने मुझ बदनसीब से !!
दिल का दर्द सहा न जाये दिखाया भी न जाये !
हादसे हुए हैं मेरे साथ यूँ ऐसे अजीब से !!
दोनों उमड़ पड़े थे दर्द की दास्तान लिखने !
एक आँसू बन आँखों से एक कलम की नींव से !!
दिल तो कहता मेरा तरसती है निगाहें !
होंठ लेना चाहते उनका नाम तहजीब से !!
इतने अरमानों से मैंने सजाया आशियाँ था !
बिखर गए दिल के पन्ने यूं बेतरतीब से !!
मुहब्बत में जीना तो क्या मरना भी मंजुर था !
समझ में आता नहीं जियें किस तरकीब से !!
मुकद्दर किया हैं यूँ तेरा फैसला ‘अजनबी’ !
किससे करेगा शिकायत ? अपने रकीब से !!
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