Wednesday, July 7, 2010

50.जिन्दगी नसीब से !

गुजर गये वो आज मेरे दिल के करीब से !

कुछ न कह सका आज मैं अपने हबीब से !!

मांग था जिसे यूँ मैने रब से फरियाद कर !

मांग न सका मैं वो प्यार की जिन्दगी नसीब से !!

बेटी थी वो बडे घर की पर प्यार मुझे दिया !

काबिल समझा दिल लगाया इस गरीब से !!

कह न सका दिल तड़पते हुए अलविदा !

क्यों मिलाया उन्हें रब ने मुझ बदनसीब से !!

दिल का दर्द सहा न जाये दिखाया भी न जाये !

हादसे हुए हैं मेरे साथ यूँ ऐसे अजीब से !!

दोनों उमड़ पड़े थे दर्द की दास्तान लिखने !

एक आँसू बन आँखों से एक कलम की नींव से !!

दिल तो कहता मेरा तरसती है निगाहें !

होंठ लेना चाहते उनका नाम तहजीब से !!

इतने अरमानों से मैंने सजाया आशियाँ था !

बिखर गए दिल के पन्ने यूं बेतरतीब से !!

मुहब्बत में जीना तो क्या मरना भी मंजुर था !

समझ में आता नहीं जियें किस तरकीब से !!

मुकद्दर किया हैं यूँ तेरा फैसला ‘अजनबी’ !

किससे करेगा शिकायत ? अपने रकीब से !!


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