Wednesday, July 7, 2010

54.घर मेरा उजड़ गया !

बसने से पहले ही घर मेरा उजड़ गया !

समय कुछ ऐसा मंत्र कानो में यूँ पढ़ गया !!

मुड़कर देखा नही मैं ने कभी मुहब्बत में !

बस राहे प्यार मे यूँ आगे ही आगे बढ़ गया !!

आँसूओं से भीगोये मैंने दिल के हर पन्ने !

प्यास बुझाने चाहत की दिल घड़ा घड़ गया !!

काँटो के जंगल में किया यूँ सफर रोते रोते !

लांधा सागर गहरा ऊँचे पहाड़ चढ़ गया !!

आँखे खुली तो टुटा आज मेरे प्यार का भरम !

काँटा था या काँच का टुकडा जो पाँव में गड़ गया !!

मेरे अरमानों का लगा मुरझाने गुलदस्ता !

पीले पत्ते की तरह सपना मेरा झड़ गया !!

एक हवा का झोंका था या बुरे समय की आँघी !

मुद्दत से लगाया प्यार का पौघा उखड़ गया !!

मेरे दिल की अंगूठी तो खाली थी कल तलक !

नाम उनका नगींना बन दिल मे यूँ जड़ गया !!

प्यार नहीं मिला था किसी का फिर भी मैं खुश था !

आज मिला प्यार तो लगा किससे पाला पड़ गया !!

बहुत मनाया मैंने इस दिल को पर न माना !

जाने ऐसी क्या बात थी जो जीद में यूँ अड़ गया !!

आँखे बरस पड़ी मेरी यकायक ‘अजनबी ’ !

दर्द का बादल आँसू बन जब उमड़ गया !!


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