मेरी जिन्दगी की गुजरती हुई शाम हो तुम !
मेरे कारण पूरे कॉलेज में बदनाम हो तुम !!
मैं तो एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ प्यार का !
तुम्हीं तो मेरी मंजिल हो मेरा मुकाम हो तुम !!
मैं तो एक उजड़ा हुआ चमन हूँ चाहत का !
फिजां में महकी हुई बहारें तमाम हो तुम !!
मैंने जब दिल की बात कही तो तुमने कहा !
‘‘राधा हूँ मैं तुम्हारी आज से मेरे श्याम हो तुम’’!!
शायरी कहूँ या कविता तुम्हें ऐ मेरी जिन्दगी !
बज्म हो गजल हो मेरी मेरा कलाम हो तुम !!
कैसे करूँ में जिक्र तुम्हारा आज तुम्हीं बताओ !
दर्द भरी मुहब्बत का ऐसा पैगाम हो तुम !!
मैंने तो कर दी तुम्हारे नाम ता-उम्र जिन्दगी !
चाहे जमाना कहे मुझे प्यार के गुलाम हो तुम !!
आँसू से मिटाऊँ या अपने जिगर के खून मैं !
सच्चा हो या झूठा मगर एक इल्जाम हो तुम !!
दिल तो कहता है आज भी आवाज हूँ तुम्हें मैं !
कैसे पुकारूँ तुम्हें बताओ ऐसा नाम हो तुम !!
अपना न सका मैं तुम्हें आज ठुकरा न सका !
क्या करें ‘अजनबी’ जो एक ऐसा सलाम हो तुम !!
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