Wednesday, July 7, 2010

48.पैगाम हो तुम !

मेरी जिन्दगी की गुजरती हुई शाम हो तुम !

मेरे कारण पूरे कॉलेज में बदनाम हो तुम !!

मैं तो एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ प्यार का !

तुम्हीं तो मेरी मंजिल हो मेरा मुकाम हो तुम !!

मैं तो एक उजड़ा हुआ चमन हूँ चाहत का !

फिजां में महकी हुई बहारें तमाम हो तुम !!

मैंने जब दिल की बात कही तो तुमने कहा !

‘‘राधा हूँ मैं तुम्हारी आज से मेरे श्याम हो तुम’’!!

शायरी कहूँ या कविता तुम्हें ऐ मेरी जिन्दगी !

बज्म हो गजल हो मेरी मेरा कलाम हो तुम !!

कैसे करूँ में जिक्र तुम्हारा आज तुम्हीं बताओ !

दर्द भरी मुहब्बत का ऐसा पैगाम हो तुम !!

मैंने तो कर दी तुम्हारे नाम ता-उम्र जिन्दगी !

चाहे जमाना कहे मुझे प्यार के गुलाम हो तुम !!

आँसू से मिटाऊँ या अपने जिगर के खून मैं !

सच्चा हो या झूठा मगर एक इल्जाम हो तुम !!

दिल तो कहता है आज भी आवाज हूँ तुम्हें मैं !

कैसे पुकारूँ तुम्हें बताओ ऐसा नाम हो तुम !!

अपना न सका मैं तुम्हें आज ठुकरा न सका !

क्या करें ‘अजनबी’ जो एक ऐसा सलाम हो तुम !!


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