उजड़ा हुआ इक चमन हूँ मैं !
बिखरा हुआ इक गुलशन हूँ मैं !!
रगों में खून नहीं आँसू बह रहे !
दर्द भरी यादों की चूभन हूँ मैं !!
चाहत की चिता को देता हूँ आग !
अरमानों का जिन्दा कफन हूँ मैं !!
दिल में दर्द है अश्क आँखों में मेरे !
कांटो में पलता वो सुमन हूँ मैं !!
औरों के इशारे पर हँसता रोता !
क्या करूँ ‘अजनबी’ दर्पण हूँ मैं !!
रेत से सीप को अपनालो कोई !
दिल का अनमोल रतन हूँ मैं !!
अश्के गम पी के है बुझाई प्यास !
आज फिर भी प्यासा-सावन हूँ मैं !!
लोग कहें बुझता हुआ चिराग !
उम्मींद की आखरी किरण हूँ मैं !!
आरजू नहीं रहीं दिल में अब !
जिन्दगी नहीं ऐसा जीवन हूँ मैं !!
एक था ‘कृष्ण’ जिसकी लाखों दिवानी !
इक ‘राधा’ नहीं वो ‘किशन’ हूँ मैं !!
ashke gam pee ke hai bujhai pyas....kya bat kahi apne.Ati sunder.
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