Thursday, July 8, 2010

60.कटी पतंग हूँ मैं !

जिन्दगी से आ गया तंग हूँ मैं !
देख दिल के हादसे दंग हूँ मैं !!
जुड़ नहीं सकता फिर से कभी !
ऐसा कटा हुआ अंग हूँ मैं !!
जी तो रहा हूँ बस जीने के लिए !
हृदय से जबकि अपंग हूँ मैं !!
मचलता था कभी तुफान में मैं भी !
सर पटकता आज तरंग हूँ मैं !!
जब से छुटा साथ उनका मेरा !
आज अकेला तन्हा निःसंग हूँ मैं !!
विजय हुई न पराजय कभी !
मुद्दत से छिड़ी हुई ऐसी जंग हूँ मैं !!
प्रीत डोर से बंध उड़ा नभ में !
आज लेकिन कटी - पतंग हूँ मैं !!
सपने हैं न अरमन जीवन में !
वक्त से हारी ऐसी उमंग हूँ मैं !!
कोई तो परखे तुलिका मे मुझे !
तस्वीरें प्यार का कैसा रंग हूँ मैं !!
किस को बताऊं मैं कैसे ‘अजनबी ’ !
जिसकी खातिर यूँ बदरंग हूँ मैं !!

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