Thursday, July 8, 2010

71.धोखा था सनम !

सच बता तेरा प्यार क्या एक धोखा था सनम !
या प्यार की सुगंध लिये एक झोंका था सनम !!
पहली मर्तबा मैंने अपने दीवाने पन में !
तेरे नाम का कील हृद्य में ठोंका था सनम् !!
दुनिया देखी मैने तेरी आखों में ये नैना तेरे !
जिन्दगी को झांकने का एक झरोखा था सनम !!
लफ्ज बनकर उतर आये थे यूँ खत में प्यार !
दिल की बातें कहने का हसी मौका था सनम !!
वर्षो के प्यार को भूलाना मूमकीन नहीं पल में !
हमारे खत में हमारा लेखा जेखा था सनम !!
कसक बीते लम्हों की याद दिलाती जब जब !
लगता है अपना वो प्यार अनोख था सनम !!
तेरे प्यार में जीना तो क्या मरना भी मंजूर था !
क्या करूँ एक ही बात ने मुझे रोका था सनम !!
किसी ने किसी को यूँ दिया नही धोखा ‘अजनबी’ !
धोखे के बारे सोचना भी एक धोखा था सनम !!

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