Wednesday, July 7, 2010

49.खुशबू नहीं है !

जीने की कोई आरजू नहीं है !

जीवन की कोई जुस्तजू नहीं है !!

काँटो में पलता वो गुलाब हूं!

मुझ में कोई खुशबू नहीं है !!

बेवफा है कौन बता मुझको !

यादे है तेरी पास तू नहीं है !!

तेरी यादों में रोये हैं इतने कि !

देख आँखो में आज आँसू नहीं है !!

आज भी लिखता मैं खून से खत !

क्या करूँ जो रग में लहू नही ह्रै !!

प्यासा खड़ा है ‘अजनबी’ आशिक !

पास फूल है पर मधु नहीं है !!

तेरे हम शक्ल को भी अपना लेता !

यहाँ तो कोई तेरी हुबहू नहीं है !!

मेरे दिल पर जो बीत रही है !

तुझे क्या पता तू रूबरू नहीं है !!



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