जीने की कोई आरजू नहीं है !
जीवन की कोई जुस्तजू नहीं है !!
काँटो में पलता वो गुलाब हूं!
मुझ में कोई खुशबू नहीं है !!
बेवफा है कौन बता मुझको !
यादे है तेरी पास तू नहीं है !!
तेरी यादों में रोये हैं इतने कि !
देख आँखो में आज आँसू नहीं है !!
आज भी लिखता मैं खून से खत !
क्या करूँ जो रग में लहू नही ह्रै !!
प्यासा खड़ा है ‘अजनबी’ आशिक !
पास फूल है पर मधु नहीं है !!
तेरे हम शक्ल को भी अपना लेता !
यहाँ तो कोई तेरी हुबहू नहीं है !!
मेरे दिल पर जो बीत रही है !
तुझे क्या पता तू रूबरू नहीं है !!
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