किसने भरी नफरत इन निगाहों में !
खाई हैं चोट चूँकि मुहब्बत की राहों में !!
फरियाद अमन की करते रहे लब !
छीनता गया चैन यूँ बेचैन पनाहों में !!
अपने साये से भी यूँ डरने लगे हम !
इस कदर भरी दहशत हवाओं में !!
जलती रही बस्तियाँ चाहत की अपनी !
आहें मासूम चीखे दब नई कराहो में !!
शोलों की तरह टपके है आँखो से अश्क !
प्यार छूपा होता था कभी जिन निगाहो में !!
आज नफरत का क्यों यूँ आलम है छाया !
बिताई है जिन्दगी जबकि किसी की चाहो में !!
जुदाई तन्हाई रुसवाई और बेवफाई !
रंजोगम सितम शमिल है गवाई में !!
प्यार की डगर को करने लगे सलाम !
खोये थे दोनों एक दुजे की बांहों में !!
जुदा हुए कैसे राघा किशन ‘अजनबी ’!
कैसी सजा मिली उन्हें प्यार के गुनाहों में !!
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