Wednesday, July 7, 2010

52.किसने भरी नफरत !

किसने भरी नफरत इन निगाहों में !

खाई हैं चोट चूँकि मुहब्बत की राहों में !!

फरियाद अमन की करते रहे लब !

छीनता गया चैन यूँ बेचैन पनाहों में !!

अपने साये से भी यूँ डरने लगे हम !

इस कदर भरी दहशत हवाओं में !!

जलती रही बस्तियाँ चाहत की अपनी !

आहें मासूम चीखे दब नई कराहो में !!

शोलों की तरह टपके है आँखो से अश्क !

प्यार छूपा होता था कभी जिन निगाहो में !!

आज नफरत का क्यों यूँ आलम है छाया !

बिताई है जिन्दगी जबकि किसी की चाहो में !!

जुदाई तन्हाई रुसवाई और बेवफाई !

रंजोगम सितम शमिल है गवाई में !!

प्यार की डगर को करने लगे सलाम !

खोये थे दोनों एक दुजे की बांहों में !!

जुदा हुए कैसे राघा किशन ‘अजनबी ’!

कैसी सजा मिली उन्हें प्यार के गुनाहों में !!


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