Thursday, July 8, 2010

74.रब की मर्जी !

किस्मत का इसे हम खेल कहें
या कहें हम इसे रब की मर्जी !
तकदीर में जो लिखा है रब ने
वो हो नहीं सकता कभी फर्जी !!
अपनी झोलियाँ फैलायी हमनें
दर दर भटका चाहत में !
हमारी दुआयें कुबुल न हुई
यूँ बैरंग लौट आई हर अर्जी !!
हर किसी पे यूँ आता नहीं दिल
होता नहीं प्यार हर किसी से भी !
दिल कोई लिबास नहीं जो कभी
फटे तो सी सके उसे कोई दर्जी !!
अब तो घबराता है यह दिल
सुन कर नाम मुहब्बत का !
नफरत-सी होने लगी है हमें
प्यार शब्द से ही ज्यों मानो एलर्जी !!
प्यार के बदले जिसे प्यार मिल गया
वे बड़ा खुशनसीब है जहाँ में !
प्यार जीने का सहारा है एक
इसी से मिलती है जीने की एनर्जी !!
चाहत चाहत होती है हमेशा
जो देती है दिल को सुकूं राहत !
चाहत में होता है अपनापन
होती नहीं ‘अजनबी ’ खुदगर्जी !!किश्मत का इसे हम खेल कहें
या कहें हम इसे रब की मर्जी !
तकदीर में जो लिखा है रब ने
वो हो नहीं सकता कभी फर्जी !!
अपनी झोलियाँ फैलायी हमनें
दर दर भटका चाहत में !
हमारी दुआयें कुबुल न हुई
यूँ बैरंग लौट आई हर अर्जी !!
हर किसी पे यूूँ आता नहीं दिल
होता नहीं प्यार हर किसी से भी !
दिल कोई लिबास नहीं जो कभी
फटे तो सी सके उसे कोई दर्जी !!
अब तो घबराता है यह दिल
सुन कर नाम मुहब्बत का !
नफरत-सी होने लगी है हमें
प्यार शब्द से ही ज्यों मानो एलर्जी !!
प्यार के बदले जिसे प्यार मिल गया
वे बड़ा खुशनसीब है जहाँ में !
प्यार जीने का सहारा है एक
इसी से मिलती है जीने की एनर्जी !!
चाहत चाहत होती है हमेशा
जो देती है दिल को सुकूं राहत !
चाहत में होता है अपनापन
होती नहीं ‘अजनबी ’ खुदगर्जी !!

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