Thursday, July 8, 2010

100.पाण्डुलिपियाँ !



मेरे जनाजे में न किसी के आँसू होंगे
न किसी की सिसकियाँ अजनबी !
मेरी लाश को यूँ गुजरते देखेंगी
दुनिया वालों की अँखियाँ अजनबी !!
नामो निशान तो मेरा मिट ही जायेगा
इस दुनिया से हमेशा के लिए !
शेष रह जायेंगी केवल मेरी लिखी
कुछ पाण्डुलिपियाँ अजनबी !!

99.खुदकुशी से !

मेरी मौत की खबर सुन क्या वे कभी रोयेंगे भी
या उछल पड़ेंगे खुशी से !
मौत से भी ‘गर आँखों से आँसू न बहे तो
बेहतर है मर जाना खुदकुशी से !!

98.दावत में !

हम तो लूट गये सौ-फिसदी किसी की चाहत में अजनबी !
पता नहीं वो कहाँ है कैसी है किस हालत में अजनबी !!
उनसे मिले इक मुद्दत हुई तरस रहे हम दीदार को !
काश हो जाती मुलाकात कहीं किसी की दावत में अजनबी !!

97.कमी रह गयी !

जी भर के रोये यादों में उनकी
फिर भी आँखों में मेरी नमी रह गयी !
प्यार मिला मिली चाहत वफा
फिर भी जिन्दगी में उनकी कमी रह गयी !!
वक्त ने ढाया हम पे ऐसा कहर कि
जुदा हो गये हम दोनों ‘अजनबी’ !
जुदा होते जैसे सितारे चाँद से
आस्मां से जुदा हो तन्हा जमीं रह गयी !!

96.संजो सकूँ !

कहाँ है ऐसी गोद जहां सिर रख मैं सो सकूँ !
वो हो जाये मेरी ही सदा मैं उसी का हो सकूँ !!
काश मिल जाती मुझको कहीं ऐसी एक आंख !
जिसमें आँखे डाल मैं यूँ सपने संजो सकूँ !!

97.कोई तो नहीं !

कोई तो नहीं इस जहाँ में, जिसे हम आज अपना कहें !
आँसू बहाके भीगोलें नैन, देखें ख्वाब और सपना कहें !!

94.एक यादगार अजनबी !

साथ न सही पल भर को मिला यूँ किसी का प्यार अजनबी !
शुक्र है खुदा का जो मुझको मिली मुहब्बत अपार अजनबी !!
बड़ा खुशनसीब समझता हूँ इस जहाँ मैं अपने आपको !
शुभान अल्लाह जो मुझको मिली खूबसूरत यार अजनबी !!
उनकी खूबसूरती का कौन दीवाना नहीं था पूरे कॉलेज में !
वो तो थी मानो जैसे सौ-बिमारों के लिए एक अनार अजनबी !!
कॉलेज का वो पहला दिन याद है मुझे आज भी अच्छी तरह !
जिन्दगी में पहली बार हुई थी उनके आँखें चार अजनबी !!
उनकी सुन्दर झील-सी आँखें देख पल भर को खो-सा गया !
दिल ही दिल में यूँ दे दिया दिल जैसे हुआ दिदार अजनबी !!
कँप कँपा रहे थे होंठ मेरे, धड़क रहा था दिल धक् धक् !
अपने प्यार का करना चाहा जिस दिन इजहार अजनबी !!
बड़ा ही शुभ दिन था वो जब मिला मुझे उनका पहला खत !
जिसमें किया था खुशी से उन्होंने प्यार का इकरार अजनबी !!
खुशी से मैं फूला नहीं समाया कदम न पड़ते जमीं पर थे !
सूने जीवन में मेरे जब वो आए बनके बहार अजनबी !!
उनकी गहरी झील-सी आँखों में नैया उतारी थी मैंने दिल की !
ज्यों ज्यों गहराया प्यार हमारा हुए उनपे निसार अजनबी !!
बेहद खूबसूरत थी तनसे वो मन से तो और भी भावुक !
उनकी जुल्फों से खेलने का मुझे मिला था अधिकार अजनबी !!
एहसासे जन्नत होता था जब जब लिपटती मेरी बाहों में !
गर्म साँसों के बीच दोनों की होता उनका रूखसार अजनबी !!
मेरी कविताओं की करके प्रशंसा लिखने की दी प्रेरणा मुझे !
जन्मदिन में दिया था उन्होंने कलम का उपहार अजनबी !!
मुझसे मिलने आई थी सहेली के संग जब चढ़ा बुखार था !
कैसे भूलूँगा मैं तुम्ही बताओ उनका ये उपकार अजनबी !!
उनसे बंधी थी उम्मीद जीने की लाखों अरमाँ थे दिल में मेरे !
उनके बिना यूँ सूना-सा लगता दुनिया का बाजार अजनबी !!
दिल के दिये हैं जलते आँसू बहते खुशबू आती है वफा की !
उनकी यादों में यूँ आवाद है मुहब्बत का मजार अजनबी !!
इस जनम में मैं उन्हें पा न सका यह मेरी बदनसीबी है !
अगले जनम तक करूँगा मैं उनका इंतजार अजनबी !!
शाहाजहाँ ने बनवाया था मुमताज की याद में ताजमहल !
उनकी यादों में यूँ बना रहा हूँ शब्दों की मैं मीनार अजनबी !!
अपने खून से लिखे थे हम दोनों ने कभी एक दुजे को खत !
अपनी मुहब्बत की दास्तान तो है एक यादगार अजनबी !!

93.मुबारकबाद अजनबी !

क्यू आ रही है इस कदर उनकी याद अजनबी !
कसक छिपी है आज भी दस साल बाद अजनबी !!
इस जनम में उन्हें पाना ना मुमकिन ये तय है !
फिर भी से दिल क्यों कर रहा फरियाद अजनबी !!
जिन्दगी के किसी मुकाम पर यूँ साथ चले थे !
वक्त ने किया हमें बंधन तोड़ आजाद अजनबी !!
माना कि हम बिछुड़ गये है पर दिल तो है पास !
आँसू बहाके कर तो सकते है आबाद अजनबी !!
दिल के किसी कोने में उनकी आज भी होती है पूजा !
होता है अहसासे प्यार ज्यों ज्यों आरती में खोया ही रहूँ मैं !
दिल तो करता है उनकी यादों में खोया ही रहूँ !
इश्क में अश्क बहा करता रहूँ इजाद अजनबी !!
प्यार का यह सफर भी कितना अजीब है देखिये !
पूरी नही होती कभी भी इसकी जो मियाद अजनबी !!
कैसी सुन्दर आँखे थी उनकी जो फिदा हो गया !
आज भी देता हूँ मैं उन निगाहों को दाद अजनबी!!
उनकी जैसी खूबसूरत लडकी देखी नही कही !
इस धरती पर मैने कभी वर्षो बाद अजनबी !!
जब जब उनकी प्रशंसा में सुनाना चाहा मैंने शेर !
बडे अदब से कहती थी वो इरशाद अजनबी !!
आज जन्मदिन है उनका मना रही होगी खूशियाँ !
काश मैं भी दे पाता उन्हें मुबारकबाद अजनबी !!
दिल में उठते ज्वारों को कैसे अल्फाज दूँ !!
कैसे करूँ मैं दिल की बातों का अनुवाद अजनबी !!
काश मेरी माँ आज जिन्दा होती तो उसे कहती ‘बहू’!
होती कितनी खुश और देती आशीर्वाद अजनबी !!
उनकी जुल्फों साये में हुई चुपके-चुपके बातें !
आते है याद आज मुलाकातों के संवाद अजनबी !!
उनकी गोद में सिर रख जब जब सुना दुखड़ा !
चखा है आँखों से टपके आँसुओं का स्वाद अजनबी !!
मुहब्बत की यूँ झुठी दास्तान में मैं क्या से क्या हो गया !
कभी कभी सोचता प्यार है एक उन्माद अजनबी !!
मुकद्दर बनाने वाले को जब तरस ही न आई !
तो मैं आज यहाँ किससे करूँ प्रतिवाद अजनबी !!
वक्त से बड़ा ताकतवर कोई होता ही नही यहाँ !
वक्त बनता मलहम कभी कभी जल्लाद अजनबी !!

92.रोती थी तू !

मेरी सीने में सिर रखकर कभी रोती थी तू !
रात भर खयालो में खोकर नही सोती थी तू !!
तेरे प्यार में में पागल हुआ कोई शक नही !
दिल मुझे देके प्यार में पागल-सी होती थी तू !!
मुझे देख खिल उठता तेरा चाँद-सा चेहरा !
आँखों में आँखें डालकर सपने संजोती थी तू !!
तेरे एक झलक पाने को दिल रहता है बेताब !
खत में इस कदर चाहत के बीज बोती थी तू !!
उम्मीद की किरण बनकर आई जिन्दगी में !
मेरे अंघेरे जीवन की मानो इक ज्योती थी तू !!
तेरे सपनो का मैं कभी होता राजकुमार था !
मेरे ख्यालो में ज्यों सपनो की रानी होती थी तू !!
कितनी हसीन लगते थे वो पल वो लम्हे !
मेरे सीने में सिर रखकर जब सोती थी तू !!
देवी माँ चरणों में जाते सिर झुकाने !
जोड़ी सलामत रहने की मांगती मनौति थी तू !!
अपनी सहेलियों को अपना दुखड़ा सुनाकर !
कॉलेज में सिसक-सिसक पलके भीगोती थी तू !!
रईस खानदान से तेरा ताल्लुक था हमेशा !
अमीर बाप की लाडली बेटी इकलौती थी तू !!
तेरा दादा ही था जिसने हमें मिलने न दिया !
दीवार बनके अड़ गया जिसकी पोती थी तू !!
तुझे खोकर मैं तड़प रहा हूँ आज भी !
राहें प्यार में मुझे मिले अनमोल मोति थी तू !!
प्यार करने वाले तो डरते नही है किसी से !
प्यार करके भी प्यार में क्यो करती कटौती थी तू !!
तू न मिली गम नही तेरा प्यार मिला क्या कम है !
‘अजनबी’ के लिये जैसे मानो इक चुनौति थी तू !!
तेरे दिये गुलाबो को मैं रखता सहेज कर !
मेरे दिये हुए गुलाबों को जूड़े में पिरोती थी तू !!
आज भी याद है मुझको वो पल अच्छी तरह !
मुझसे मिलने बाते करने बावरी सी होती थी तू !!
प्यार के सागर में पतवार खो जुड़ा हो गये !
अपने आँसूओं की झील में कभी डुबोती थी तू !!
जाने अंजाने में गर भूल हुयी हो तुझ से तो !
आँखों से यूँ अश्क बहा उस चूक को धोती थी तू !!

91.सपनो की रानी तो हुई !

उनपे निसार मेरी जवानी तो हुई !
उन्हें पाकर जिन्दगी सुहानी तो हुई !!
उनके मिलने से यूँ एक फसाना बना !
दो-लफाजों की इक कहानी तो हुई !!
प्यार में कभी मैं उनका दीवाना हुआ !
मेरी मुहब्बत में वो भी दीवानी तो हुई !!
उन्हें रानी बनाने का देखा ख्वाब था !
चलो वो किसी के सपनो की रानी तो हुई !!
दिल लगाने में मैने यूँ की थी नादानी !
इश्क करने की उनसे नादानी तो हुई !!
उन्हें पाने की तमन्ना में ऐ ‘अजनबी ’ !
बर्बाद मेरी सारी जिन्दगानी तो हुई !!
प्रेमग्रंथ में जुडे़ ‘राधा-किशन’ के नाम !
खुदा की हमपे मेहेरबानी तो हुई !!
पल भर सही दोनों का दिल तो बहला !
अपने प्यार की तस्वीर नूरानी तो हुई !!
राजमहल का सुख मैं कहाँ दे पाता !
लिहाजा वो और की पटरानी तो हुई !!

90.दस साल हो गये !

उनसे जुदा मुझे आज पुरे दस साल हो गये !
राहे प्यार में चलते-चलते मेरे ये क्या हाल हो गये !!
हकीकत की जमी पर मेरी चाहत हसरत आरजू !
प्यार भरे सारे अरमान मेरे यूँ हलात हो गये !!
उन्हें पाकर यूँ लूटा दिये दिल के प्यार भरे वो खजाने !
उन्हें खोकर आज चाहत में हम कैसे कंगाल हो गये !!
लड़कपन की उस नाजुकसी दौर-ए-उम्र में कभी !
दिल देकर उन्हें प्यार में उनपे ननिहाल हो गये !!
प्यार के उस महके-महके बहके मस्त आलम में !
हमें लगता था जैसे प्यार में मालामाल हो गये !!
साथ जीने मरने की हमने खाई कसम थी क्या करे !
मुसीबत के उस दौर में खड़े ऐसे सवाल हो गये !!
जाते जाते उनसे किया था इक सवाल ‘अजनबी’ !
जवाब मे शर्म व गुस्से से उनके गाल लाल हो गये !!
यह तो खुदा की मेहरबानी है लाख-लाख उन्हें शुक्रिया !
जो प्यार में उठे झगडे़ हमारे आज बहाल हो गये !!
मेरी जिन्दगी हुई बर्बाद फिर भी मैं बेहद खुश हूँ !
उनकी तो जिन्दगी संवरी जीवन खुशहाल हो गये !!

89.गवाही देखना !

जिन्दगी की राहों में कभी तुम ‘अजनबी’ राही देखना !
किसी की चाहत में कैसे हुई मेरी तबाही देखना !!
खून से लिखे खत से उन्हे ऐतबार न हुआ !
अश्क ही देगें मेरे प्यार की एक गवाही देखना !!
जिसकी यादों में लिख रहा हुँ मैं गजल आँसूओ में !
रंग लाएगी कभी तो मेरे आँसूओं की स्याही देखना !!
दिल से जिसे कभी अपनाया था मैनें उसे पा न सका !
रह जायेगी मेरी जवानी यूँ कवांरी बिन ब्याही देखना !!
जिनकी यादों को समेट कर मैं लिख रहा हूँ कविता !
आँसूओं से भर जायेगी ‘गुलदस्ता’ की सूराही देखना !!
युग युग तक याद सब लोग करेंगे ‘राघा किशन’ को !
हरेक होठों पे होगी हमारी कहानी ऐ मेरे माही देखना!!

88.मजबूर है अजनबी !

दिल से दिल दूर है अजनबी !
कितना मजबूर है अजनबी !!
क्या करें कुछ समझ में न आए !
किसको ये मंजुर है अजनबी !!
ढाया है ऐसा सितम आज देखो !
वक्त कितना क्रुर है अजनबी !!
बेरहम बेजिगर बेदर्दी सा !
खुदा भी तो निष्ठुर है अजनबी !!
प्यार का उजड़ना-बिछड़ना तो !
दुनिया दस्तुर है अजनबी !!
बिखर गया गुलिस्तां चाहत का !
हुआ चकना चुर है अजनबी !!
आज भी तो दिल हमारे प्यासे है !
मिलने को आतुर है अजनबी !!
सुखे ख्वाब तो बेजाब हुई आँखे !
खोया अपनी नुर है अजनबी !!
उड़ गया प्यार का रगं यूँ देखो !
जैसे मानो कपूर है अजनबी !!
मस्त थे दिल दोनों प्यार में कल !
आज खोया शुरूर है अजनबी !!
होना था मांग में मेरा पर ये क्या !
किसका ये सिन्दूर है अजनबी !!
‘राधा’ का या ‘किशन का रब जाने !
किसका ये कुसूर है अजनबी !!

87. मधुमास न ढूँढो !

निराश जीवन में आस न ढूँढो !
निरस जीवन में उच्छवास न ढूँढो !!
खारेपन से भरा सागर हूँ मैं !
मुझ में पानी की मिठास न ढूँढो !!
मैं पतझर की हूँ सूखी टहनी !
मुझ में कोई मधुमास न ढूँढो !!
पत्थर की चट्टान है ये मेरा दिल !
इसमें चाहत की हरी घास न ढूँढो !!
बेजान कब से हूँ मैं जिन्दा लाश !
बंद है नाड़ी मेरी साँस न ढूँढो !!
खो चुका हूँ अब हौंसला अपना !
है ही नही, आत्म विश्वास न ढूँढो !!
विरह विषाद वेदना व्यथा से !
यूँ चूर उर में उल्लास न ढूँढो !!
जीवन जंगल का मैं भटका राही !
हूँ आज बेहद उदास न ढूँढो !!
कट गए पंख सारे ‘अजनबी’ !
उड़ने की चाह में आकाश न ढूँढो !!
जीवन साहित्य में मेरा शब्दार्थ !
व्याकरण-संधी -समास न ढूँढो !!
मुक्तक हूँ मैं, छन्दमुक्त मुझ में !
श्लेष, यमक, अनूप्रास न ढूँढो !!
बना रहा हूँ शब्दो की इमारत मैं !
किसने किया शिलान्यास न ढूँढो !!
शब्द ही तो सहारा है मेरे जीने का !
‘अर्थ’ लेकिन मेरे पास न ढूँढो !!
एक गुजारिश है आपसे मेरी !
भविष्य-हीनों का इतिहास न ढूँढो !!
किस कदर हुआ हूँ बर्बाद मैं !
कर के मेरा उपवास न ढूँढो !!
उब चुका हूँ इस माया मोह से !
मुझमें कोई भोग विलास न ढूँढो !!
लिख-लिख के मैं आँसू से कविता !
मिटा रहा हूँ दिल का भड़ास न ढूँढो !!
‘राधा-किशन’ की है लघु कहानी !
इसमें कोई उपन्यास न ढूँढो !!



86.राजमहल मिला !

पिछले जनम के किन कुकर्मो का मुझे फल मिला !
पहली बार में ही मुहब्बत में जुठा पत्तल मिला !!
उन्होंने नही भाग्य ने किया है मुझसे विश्वासघात !
अमृत से लग रहे प्यार में आखिर गरल मिला !!
मुद्दत से सहेजकर रक्खा था मैंने इस दिल को !
पहली मर्तबा जब उन्हें दिया तो भी घायल मिला !!
बड़ी हसरत से मैं तो उन्हें लिखता था यूँ प्रेम पत्र !
जिसका जवाब इतनी बेरूखी से मुझे कल मिला !!
इक तमन्ना थी मेरी भी चाहत के कुछ सपने थे !
जीवन के इस क्षेत्र में मैं क्यों ऐसे असफल मिला !!
यह तो मेरी बदकिश्मती है उनका भला क्या दोष !
प्यार के नाम पर उनका लिखा खत केवल मिला !!
कंचन समझकर उन्हें मैं तो हो गया था मोहित !
कसौटी पर जब परखा सोने को तो पीतल मिला !!
चाँद सितारों से सजाने की सोचा था जिस दामन को !
किसी और की यादों में भीगा उनका आँचल मिला !!
प्यार के रंग में रंगना चाहा मेरी ये कोरी जिन्दगी !
सिन्दूरी की डिबिया उठाई तो उसमें काजल मिला !!
प्यास चाहत की मेरी अबतक यूँ अधूरी ही रही !
बहुत ढूँढ़ा पर कही न मुझे निर्मल जल मिला !!
मैने पूछा अपने आप से यूँ आँसू क्यों बहा रहा हूँ !
दिल को तलाशा तो देखा दर्द का छाया बादल मिला !!
कोशिश तो बहुत की मैंने मगर भुला न सका हूँ !
उनका दिया हुआ प्यार भरा दर्द हर पल मिला !!
मैंने किया है फैसला यूँ आज से दिल न दूँगा कभी !
जब भी दिया दर्द मिला अश्के गम मिले छल मिला !!
चाहा तो हमने बगिया में प्यार के फूल ही फूल हो !
क्या करे जो तकदीर में लिखा काँटो का जंगल मिला !!
वफा के बदले वफा मिले और संवरे जिन्दगी !
सोचा यही पर आँसू से भीगे गीतो गजल मिला !!
मेरी कुटिया उजड़ी इस बात का गम नही मुझको !
मैं तो यूँ खुश हूँ बहुत कि उन्हें राजमहल मिला !!
आँसूओं की ठहरी हुई इस जीवन रूपी झील में !
जब भी मैं ढूँढ़ा उनकी यादों का खिला कवँल मिला !!
कितना गहरा था उनसे मेरा प्यार अजनबी !
जो नाम लेते ही उनका, मेरा नयन सजल मिला !!

85.खत खून से लिखा था !

प्यार करना मैंने केवल तुझसे सीखा था !
अपने दिल पर बस तेरा ही नाम लिखा था !!
हसीना तो लाखों थी मेरी नजर के सामने !
मगर तेरी निगाहों में क्यों मुझको प्यार दिखा था !!
हम तो आए थे पेश नर्मी से तेरी चाहत में !
तेवर तेरे जलवा तेरा क्यों इतना तीखा था !!
मैंने तो चाहा था खून से तेरी मांग मैं भर दूँ !
मगर दाग बना माथे में जो प्यार का टीका था !!
बधाई देने तुझको तेरे ‘जन्मदिन’ पर !
ऊँगली काट कर मैंने खत खून से लिखा था !!
आज भी रखा हूँ दिल में तेरे प्यार को संजोके !
उड़ गया क्यों तेरे प्यार का रंग क्या फिका था !!
मेरी जिन्दगी में तो अब अंधेरा ही अंधेरा है !
खोया प्यार का प्रकाश जो जलाता दीप-शिखा था !!
कोशिश तो बहुत की तुझे समझने की मैंने !
पर समझा नहीं तेरे प्यार का जो सलिका था !!
किसी को चाहना भी आज क्यों गुनाह है ‘अजनबी’ !
तेरी मुहब्बत में यही सबक मैंने सीखा था !!

84.फरियाद कर रहा हूँ !

आँसू बहाकर आज भी मैं किसी को याद कर रहा हूँ !
पा नही सकता जिन्हें फिर भी फरियाद कर रहा हूँ !!
मेरी मुहब्बत रंग लाये न लाये गम नहीं मुझको !
चाहत का दीवाना मैं प्यार बेबुनियाद कर रहा हूँ !!
बेइंतहा की है मैंने मुहब्बत किसी को दिलोजां से !
आँसू बहा आज चाहत का जहाँ आबाद कर रहा हूँ !!
बेवकूफ हैं वे लोग जो कहते है मुझको ‘अजनबी’ !
कि अपनी जवानी व जिन्दगी मै बर्बाद कर रहा हूँ !!
उन्हें क्या मालूम कि मुहब्बत भी कोई चीज होती है !
ये सच है मैं प्यार ‘लैला मजनू’ के बाद कर रहा हूँ !!
मैंने भी देखे थे सपने कुछ ख्वाब संजोये पलको में !
उन अरमानों को आँसू के संग आजाद कर रहा हूँ !!
तकदीर का फैसला सुन आज रो पड़ा मेरा ये दिल !
गुजरे हुए वक्तों को मैं इसीलिये याद कर रहा हूँ !!
काश वो होती मेरी बाहों में तो सपने सजाता आज मैं !
बीते लम्हों को शब्दों में लिहाजा अनुवाद कर रहा हूँ !!
तकदीर की लिखावट में यूँ धोखा ही लिखा था शायद !
इसीलिये मैं किसी से न कोई प्रतिवाद कर रहा हूँ !!
मैने किया है प्यार जिन्हें यूँ वसीयत में उनके नाम !
मैं ये दिल ये जिगर ये जिन्दगी जायदाद कर रहा हूँ !!

83.मेरी बाहों में !

काश तुम होती आज मेरी बाहों में !
तस्वीरें देखता तुम्हारी निगाहों में !!
जिन्दगी मेरी भी कितनी हसीन होती !
चलता मैं भी मुहब्बत की राहों में !!
अश्क न बहते ऐसे आँखों से मेरे !
दर्द न पलता प्यार की पनाहों में !!
मेरी मुहब्बत जो कभी रंग लाती !
कराहें छिपी न होती इन आहों में !!
बीते लम्हों की कसक याद दिलाती !
गुजारे हैं जो वक्त किसी की चाहों में !!
चाहत की रूह मेरी भटक रही है !
आज भी देखो यादों की इदगाहों में !!
समन्दरे दिल में उठाते आज भी तूफान !
प्यार के ज्वार समय की सलाहों में !!
मैं तो यूँ खुश हूँ ‘अजनबी’ कि मुझको !
अश्क ही मिले हैं इश्क के गुनाहों में !!
तकदीर ने ही हमें धोखा दिया वर्ना !
हम भी गिने जाते प्यार के शहंशाहों में !!

82.सुहाग रात होती !

अगर आज जा तु मेरे साथ होती !
हुई न जो कल तक वो बात होती !!
सितारे से सजाता माँग में तेरी !
दुल्हन तुझे बनाता ‘गर औकात होती !!
फुलों के बिस्तर में तुझे मै लिटाता !
किस्मत में जो लिखी सुहागरात होती !!
मेरे संग होता तेरा ‘शुभ विवाह’ !
हम दोनो की ‘गर एक जात होती !!
प्यार के सहारे जीते हम तुम दोनो !
जिन्दगी में खुशियों की बारात होती !!
सूरज की लाली होती होंठों में तेरी !
गुलाबी मुस्काने तेरी सौगात होती !!
तेरी हर बातों की करता मैं कद्र !
बातों में ‘गर छिपी जजबात होती !!
अकेलेपन का अहसास होता तुझको !
मेरी तरह तू भी ’गर अनाथ होती !!
दिल तुझे न देता तो यूँ ‘अजनबी’ !
आँखों से आँसुओं की न बरसात होती !!
इश्क की आग से जो मैं खेला न होता !
इश्क में मेरी न ऐसी हालात होती !!

81.सपने सजाये थे !

हमने भी कभी इन आँखो में सपने सजाये थे !
जिन्दगी में अपनी जब वो पहली बार आये थे !!
देख उन्हें घड़का था यह बेताब दिल अपना !
पहले प्यार का पहला पैगाम जब वो लाए वे !!
गुजारे थे वक्त कभी आहे भर भर सपने में !
प्यार के उस आलम में बस वो ही वो समाये थे !!
आहट से कभी-कभी रूक-सी जाती थी घड़कने !
इक झलक के लिये हमें वो इतना तरसाये थे !!
दर्द में भी छलक पड़ते थे आँसू खूशी के यूँ ही !
जब हाथों में हमने उनके नाम गुदवाये थे !!
गुनगुना नही सकते हम आज इस कदर !
प्यार के जिस गीत को हम दो मिलकर गाये थे !!
आज भी आती है उनकी याद यूँ आती रहेगी !
सच प्यार में हमने कितने आँसू बहाये थे !!
काश वो आ जाती मेरी सूनी जिन्दगी में फिर से !
जन्मदिन के मौके पर ज्यो तोहफा लेकर आए थे !!
किससे कहें हम दिल की बात आज ‘अजनबी ’!
वो नही है जिन्हें कभी अपने किस्से सुनाये थे !!

80.दिल के मेहमां थे !

चाहा था हमने भी कभी किसी को दिलोजां से !
अपनाया था दिल से जो प्यारा था दो-जहाँ से !!
बहार बनकर आए वो मेरी जिन्दगी में !
कोई और नहीं वो मेरे दिल के मेहमां थे !!
भाग्य ने जब दिया साथ राहें मुहब्बत में !
वो वक्त वो लम्हे भी हम पे यूँ मेहरबां थे !!
चाहत की खुशबू थी फैली चमने दिल में !
आरजू थी किसी की दिल में कुछ अरमां थे !!
तलाश-ए-मंजिल में निकल पड़े दो-दिल !
राहें प्यार में आगे पिछे न कोई कारवाँ थे !!
प्यार भरी जिन्दगी की जुस्तजू रही दिल में !
मुद्दत से सहेजे हुए अनोखे आशियाँ थे !!
कोई गम न था प्यार में ‘गर मर भी जाते !
दो जिस्म सही मगर हम दोनों एक जां थे !!
खुने दिल से लिक्खे हमने खत ‘अजनबी !
जब मासूम था प्यार हमारा और ये दिल नादां थे !!
आ रही याद हमें बीती कहानियाँ प्यार की !
सागर से गहरा था हमारा प्यार ऊँचे आस्मा से !!
अफसोस है कि आज हम दोनों एक साथ नही !
कहर ढाके वक्त ने हमसे लिये इम्तहां थे !!

79.फूट फूट रोती है !

आज भी मेरी आँखियाँ तुम्हारी
स्मृतियों में फूट फूट रोती है !
दिवस में देखती दिवा स्वप्न यूँ
और निशा में नही सोती है !!
सपनों के सुन्दर सुमन चुनकर
कल्पना में अल्पना के जाल बुनकर !
समय के धागे में साँसे मोति से पिरोती है !!
जीवन में अब तो स्मृतियाँ ही शेष है
बाकी जिन्दगी का मानो अवशेष है !
दीपक है न तेल बाती कहीं और नहीं कहीं ज्योति है !!
hriday को लगी यूँ जब से ठेस है
देश भी लगता क्यों मानों परदेस है !
यादों की गली में मेरी प्राण वायु,जीवन की गठरी ढोती है !!
बिखरे हुए सपनों को यूँ ही समेटकर
यादो की चाशनी में उन्हें लपेटकर !
प्यार की बस्ती बसाने की चाह में, बारबार पलकें भीगोती है!!

78.जीवन में रक्खा क्या है !

संग हीन जीवन में रक्खा क्या है !
उमंग हीन मन में रक्खा क्या है !!
फुल खिलते है न बसते पँछी !
यूँ उजड़े चमन में रक्खा क्या है !!
तुलसी होती है न रंगोली जहाँ !
ऐसे सूने आंगन में रक्खा क्या है !!
सुगंध है न सुन्दर दिखने में !
रंगहीन सुमन में रक्खा क्या है !!
नींद है न सपने आँसू अरमां !
यूँ उदास नयन में रक्खा क्या है !!
बदली है न वर्षा स्वाति बिजली !
ऐसे प्यासे-सावन में रक्खा क्या है !!
अनुराग है न प्रेम प्रीत अभिलाषा !
ऐसे रूठे साजन में रक्खा क्या है !!
बंशी बजती है न ‘राधा किशन’ !
यूँ सूने मधुवन में रक्खा क्या है !!
अब तक न बनी जो प्रेम कहानी !
ऐसे शुष्क यौवन में रक्खा क्या है !!
मृत्यू को दे दो आमंत्रण ‘अजनबी’!
यूँ निरस जीवन में रक्खा क्या है !!

77.आखरी पैगाम है !

मेरी जिन्दगी के हर पन्ने पर तेरा नाम है !
और गली गली आज मेरा प्यार बदनाम है !!
तेरा प्यार ही तो मेरे जीने का एक सहारा था !
मंजिल न मिली तो मेरा प्यार यूँ गुमनाम है !!
कितने अरमानों से हमने रखा कदम था !
चाहत के जहाँ का मगर क्या हुआ अंजाम है !!
तेरी चाहत की रोशनी से कभी हुई सुबह !
जुदाई के अंधेरे में अब तो हो रही शाम है !!
मैने कभी किसी को न धोखा दिया न रुसवा किया !
धोखेबाजी का फिर भी मुझ पर क्यों इल्जाम है !!
किसने किया मुझको यूँ बर्बाद किस तरह !
मेरी बर्बादी का मेरे पास सुबूत तमाम है !!
तेरी यादों के सहारे जी लूँगा चंद अर्सा और !
तू न सही मगर पास ये कलम व कलाम है !!
खुश रहो आबाद रहो फूलो फलो जाने वफा !
‘अजनबी ’ के प्यार का यही आखरी पैगाम है !!


76.इतिहास अजनबी !

जिन्दगी रह गई बनकर इक प्यास अजनबी !
तभी तो मैं जीवन से हुआ ऐसे उदास अजनबी !!
किसी के आने से कभी आई बहार थी जिन्दगी में !
जिसके बिना बना जीवन बदहवास अजनबी !!
यादें यादें और सिर्फ यादें ही तो बाकी है जीवन में !
यादों के सिवा कुछ भी तो नहीं मेरे पास अजनबी !!
निगाहों ने गवांया उन्हें पाया था जिसे कभी दिल ने !
आज भी लगता है जैसे हो उसकी तलाश अजनबी !!
दिल से चाहा मैने जिसे पा न सका उन्हें जीवन में !
अफसोस बनकर रहा मेरा इतिहास अजनबी !!
खून से लिखे खत का उन्होंनें दिया जवाब था खून से !
मुझको आज भी होता है प्यार का अहसास अजनबी !!
उनके आने से आ जाती फिर से बहार जीवन में !
राहें जिन्दगी में ’गर मिल जाती वो काश अजनबी !!
ये दुनिया ये महफिल क्यों लगती मुझे विरान-सी !
उनके बगैर जैसे मैं इक जिन्दा लाश अजनबी !!
भूल कर भी न प्यार करना ऐ दुनियावालों कभी !
प्यार से सजता जीवन या होता सर्वनाश अजनबी !!
बीते दिनों की यादों में लिख रहा हूँ कविता आंसूओ से !
इस कदर मिटा रहा दिल का भड़ास अजनबी !!

75.आँसुओं की झील !

तुम्हारे बिना जीना कितना मुश्किल हो चला है !
जीवन मेरा अब तो और बोझिल हो चला है !!
चाहत की राहों में कभी मैं निकला अकेला था !
कारवां बन गम तुम्हारा यूँ शामिल हो चला है !!
तुम्हारी यादों में आज भी मैं रोता अकेले ही हूँ !
नयन अब तो आँसुओं की झील हो चला है !!
तेरा दिया हुआ प्यार का तोहफा भी आजकल !
जाने क्यों मेरी मुहब्बत का कातिल हो चला है !!
तेरी यादों में खोना और बहाते रहना आँसू !
आलम-ए-जुदाई की कैसी मंजिल हो चला है !!
तेरा दिया हुआ जख्म दिल में घाव बन गया !
टीस भरा वो दिल का दर्द अब साहिल हो चला है !!


74.रब की मर्जी !

किस्मत का इसे हम खेल कहें
या कहें हम इसे रब की मर्जी !
तकदीर में जो लिखा है रब ने
वो हो नहीं सकता कभी फर्जी !!
अपनी झोलियाँ फैलायी हमनें
दर दर भटका चाहत में !
हमारी दुआयें कुबुल न हुई
यूँ बैरंग लौट आई हर अर्जी !!
हर किसी पे यूँ आता नहीं दिल
होता नहीं प्यार हर किसी से भी !
दिल कोई लिबास नहीं जो कभी
फटे तो सी सके उसे कोई दर्जी !!
अब तो घबराता है यह दिल
सुन कर नाम मुहब्बत का !
नफरत-सी होने लगी है हमें
प्यार शब्द से ही ज्यों मानो एलर्जी !!
प्यार के बदले जिसे प्यार मिल गया
वे बड़ा खुशनसीब है जहाँ में !
प्यार जीने का सहारा है एक
इसी से मिलती है जीने की एनर्जी !!
चाहत चाहत होती है हमेशा
जो देती है दिल को सुकूं राहत !
चाहत में होता है अपनापन
होती नहीं ‘अजनबी ’ खुदगर्जी !!किश्मत का इसे हम खेल कहें
या कहें हम इसे रब की मर्जी !
तकदीर में जो लिखा है रब ने
वो हो नहीं सकता कभी फर्जी !!
अपनी झोलियाँ फैलायी हमनें
दर दर भटका चाहत में !
हमारी दुआयें कुबुल न हुई
यूँ बैरंग लौट आई हर अर्जी !!
हर किसी पे यूूँ आता नहीं दिल
होता नहीं प्यार हर किसी से भी !
दिल कोई लिबास नहीं जो कभी
फटे तो सी सके उसे कोई दर्जी !!
अब तो घबराता है यह दिल
सुन कर नाम मुहब्बत का !
नफरत-सी होने लगी है हमें
प्यार शब्द से ही ज्यों मानो एलर्जी !!
प्यार के बदले जिसे प्यार मिल गया
वे बड़ा खुशनसीब है जहाँ में !
प्यार जीने का सहारा है एक
इसी से मिलती है जीने की एनर्जी !!
चाहत चाहत होती है हमेशा
जो देती है दिल को सुकूं राहत !
चाहत में होता है अपनापन
होती नहीं ‘अजनबी ’ खुदगर्जी !!

73.प्यार क्यों किया !

धोखा जब देना ही था तो मुझको प्यार क्यो किया !
अपनी झूठी मुहब्बत का यूँ इजहार क्यों किया !!
तुम्हारा प्यार न मिलता तो भी मैं जी सकता था !
इस कदर मेरे दिल को बेकरार क्यों किया !!
दिल जब तोड़ना ही था तो पहले ‘ना’ कर देते !
बीच मंझधार में लाके बे-पतवार क्यों किया !!
साथ निभाने जब हिम्मत ही न थी तुम में !
तो अपनी झुठी चाहत का यूँ इकरार क्यों किया !!
दोनों मिलकर जब दिल का बनाया आशियाँ था !
उसे तोड़ किसी और से घर संसार क्यो किया !!
क्या पूछ सकता हूँ मैं तुमसे ऐ जाने वफा !
प्यार करके आखिर शादी से तूने इंकार क्यों किया !!
तस्वीर ही बिगड़ी है तो आईने का क्या कुसूर !
तेरे दिल के आईने में मैने दीदार क्यों किया !!
मरी हालत देख कहते है सारे जमाने के लोग !
ऐसी भोली सूरत पे तुमने ऐतवार क्यों किया !!

72.तू न मिली मुझको !

सारी दुनिया मिली मुझको !
बस एक तू न मिली मुझको !!
जिन्दगी के सफर में तू ही !
एक बेवफा मिली मुझको !!
जां से ज्यादा चाहा मैने तुझे !
और तू खफा मिली मुझको !!
तूझको चाहा क्या बुरा किया !
जिसकी सजा मिली मुझको !!
चाहत मिली न प्यार तेरा !
न तेरी वफा मिली मुझको !!
तू ने दिया ऐसा जख्म जिसकी !
न कहीं दवा मिली मुझको !!
यारी की हसरत न रही !
ऐसी तू यारां मिली मुझको !!
घुट रहा दम आज मेरा !
कहीं न हवा मिली मुझको !!
यादें तेरी यूँ आती हमेशा !
ऐसी इक प्रिया मिली मुझको !!
जला परवाना ‘अजनबी ’!
ज्यों इक शम्मा मिली मुझको !!

71.धोखा था सनम !

सच बता तेरा प्यार क्या एक धोखा था सनम !
या प्यार की सुगंध लिये एक झोंका था सनम !!
पहली मर्तबा मैंने अपने दीवाने पन में !
तेरे नाम का कील हृद्य में ठोंका था सनम् !!
दुनिया देखी मैने तेरी आखों में ये नैना तेरे !
जिन्दगी को झांकने का एक झरोखा था सनम !!
लफ्ज बनकर उतर आये थे यूँ खत में प्यार !
दिल की बातें कहने का हसी मौका था सनम !!
वर्षो के प्यार को भूलाना मूमकीन नहीं पल में !
हमारे खत में हमारा लेखा जेखा था सनम !!
कसक बीते लम्हों की याद दिलाती जब जब !
लगता है अपना वो प्यार अनोख था सनम !!
तेरे प्यार में जीना तो क्या मरना भी मंजूर था !
क्या करूँ एक ही बात ने मुझे रोका था सनम !!
किसी ने किसी को यूँ दिया नही धोखा ‘अजनबी’ !
धोखे के बारे सोचना भी एक धोखा था सनम !!

70.औकात नहीं भूली !

सब कुछ भूला मैंने अपनी औकात नहीं भूली !
मेरे साथ बीते अतीत की वो बात नहीं भूली !!
भूलने को की मैंने यूँ कोशिश कई बार पर !
भूला नहीं पाया तुझको तेरी जजबात नहीं भूली !!
कैसे बताऊँगा मैं तुझे तू ही बता दे मुझको !
जबकि तेरी दी हुई प्यारी-सी सौगात नहीं भूली !!
तू चाहे भूला दे मुझको मेरे प्यार को जाने वफा !
भूला नहीं तुझे दिन कभी मेरी रात नहीं भूली !!
तेरी मुहब्बत को कैसे भूला सकता हूँ मैं भला !
तेरे प्यार में आई यादों की बारात नहीं भूली !!
आज भी बरस रहे है नैन देख तेरी यादों में !
प्यासी निगाहें यूँ सावन की बरसात नहीं भूली !!
तुझसे मिलना मेरा अजीबो-गरीब इत्तेफाक था !
जिन्दगी में हुई वो पहली मुलाकात नहीं भूली !!
मेरे मासुम दिल पर जो चलाया खंजर तूने !
मेरे साथ जो धोखा हुआ मैने वो घात नहीं भूली !!
समन्दरे दिल में भी मेरे कभी आया था तूफान !
जिन्दगी की करती जो डुबोई झंझावात नहीं भूली !!
शतरंज -ए जीवन में तुमने चली कई चाले !
मगर मैंने कभी राह और मात नही भूली !!

69.दिली इरादा था !

तेरे साथ जिन्दगी बीताने का मेरा इरादा था !
साथ जियेंगे साथ मरेंगे ये अपना वादा था !!
पर किश्मत को मंजूर न था फैसला अपना !
लगता है हमारे दिल में प्यार कुछ ज्यादा था !!
कितनी हसीन लगने लगी थी जिन्दगी अपनी !
वर्ना तेरे बगैर ये जीवन कितना सादा था !!
पैगाम-ए-मुहब्बत लेकर जब तू आई थी !
तुझ पे निसार होने दिल हमेशा आमाद था !!
प्यार से पुकारती थी कभी तू मुझको किशन !
मैंने भी तो तेरा नाम प्यार से रखा ‘राधा’ था !!
याद दिलाती यादें तेरी क्यों मुझको बार-बार !
राहें प्यार में अपना ये दिल कितना नादां था !!
ता उम्र निभाऊँगा प्यार तुझसे ये दावा है !
अफसोस है कि निभा न सका जो किया वादा था !!
उजड़ गया प्यार का आशियाँ मेरा ‘अजनबी’ !
प्यार की बस्ती बसाने का जबकि दिली इरादा था !!

68.तेरी तलाश में !

निकल पड़ी है निगाहें जाने क्यूँ तेरी तलाश में !
मिलजाये कहीं तू शायद मुझको इसी आस में !!
वर्षो से हम प्यासे थे और आज भी हम प्यासे है !
जाने कितने वर्ष बीत गये यादों के उपवास में !!
सावन की काली छाई घटा है नील अम्बर पर !
ढूँढने चला हूँ तुम्हें बिजली के श्वेत प्रकाश में !!
आवाज दो मुझको तुम प्रिया अकेला हूँ मैं आज !
जाने छिपी हो कहाँ धरती-पाताल या आकाश में !!
फिसल पड़े हैं चढ़ते चढ़ते उम्र की सीढ़ियाँ !
आ गये हम यूँ ही दोनों सुर्खियों के उपहास में !!
अरमान अधूरे ‘अजनबी’ तमन्नाएँ है बाकी !
क्या लौट अतीत हम चलें शब्दों के इतिहास में !!
होने लगी है खत्म उम्र की रोशनी अब शायद !
सीने से लगा लेता काश तुम होती मेरे पास में !!
जुदाई की अँधेरी रात में तन्हाई ही तन्हाई है !
दिल में बसा है प्यार तुम्हारा तुम बसी मेरी साँस में !!
तुमसे बिछुड़ कर हम कैसे तड़प रहे हैं देखों !
मोती-से चमके हैं मेरे आँसू यादों की धरी धास में !!
छलक-से आते अश्क मेरी आँखों से यकायक !
आती है याद तुम्हारी जब प्यार के एहसास में !!

67.दीवाना था अजनबी !

वो भी एक अजब जमाना था अजनबी !
मैं भी कभी किसी का दीवाना था अजनबी !!
उन्हें देखा तो जिन्दगी से प्यार होने लगा !
इससे पहले मैं बेगाना था अजनबी !!
तीरे नजर उनकी चूभ गये दिलमें !
क्या गजब का उनका निशाना था अजनबी !!
जी रहे थे हम तो यूँ चाहत के सहारे !
जीने का एक अच्छा बहाना था अजनबी !!
ख्वाबों में करते रहे सफर रातदिन !
प्यार का वो सफर सुहाना था अजनबी !!
जी भर के लूटाया प्यार हमने उन पर !
दिल तो प्यार का तहखाना था अजनबी !!
अपने आँसूओं से सीचे जो प्यार के पौधे !
क्या उसे ऐसे बिखर जाना था अजनबी !!
उजड़ गया प्यार का यूँ आशियाँ अपना !
क्या करूँ धोखे से मैं अंजाना था अजनबी !!

66.यादों की खरोंच से !

प्यार मेरे जब कचरे हो गये !
तेरे गम दिलके पहरे हो गये !!
तेरी यादों की खरोंच से यूँ आज !
जख्म पुराने मेरे हरे हो गये !!
तैरने लगे आँखों में फिर से अरमां !
समन्दरे अश्क और गहरे हो गये !!
मुकद्दर का यह कैसा फैसला देखो !
कल के खोटे सिक्के आज खरे हो गये !!
दर्दे दिल लिये की हुआ दर दर !
खुदा दूर दरबान सब बहरे हो गये !!
तकदीर की जमीं पर चाहत हसरत आरजू !
अरमान सारे शतरंजी मोहरे हो गये !!
कश्मे वादे वफा प्यारे दिल दिल्लगी !
मेरी समझ से सब परे हो गये !!
लूटना नहीं चाहा वो लूट गया खुद !
लूटने वाले फिर से हरे भरे हो गये !!
प्यार से चूने थे मैंने जो मोंगरे !
उनके जूड़े में वो गजरे हो गये !!
वफा पाने की चाहत में ‘अजनबी’ !
देंखो भविष्य में कैसे अंधेरे हो गये !!

65.दिल टूटा हुआ !

उजड़े चमन को फिरसे आज !
आबाद करने में हूँ जूटा हुआ !!
देखता नहीं कोई जाने क्यूं मुझे !
आईना जो हूँ मैं इक टूटा हुआ !!
मुहब्बत है मुझसे कोसों दूर !
इस कदर मुकद्दर रूठा हुआ !!
मुझे लूटने की कोशिश न करो !
मैं तो हूँ पहले से ही लूटा हुआ !!
वक्त का तकाजा था या अनहोनी !
भरी महफिल में मैं झूठा हुआ !!
साहिल है न मेरी मंजिल पास !
अर्से बीत गये साथ छुटा हुआ !!
वक्त के सांचे में ढल रहा हूँ !
प्यार की राहों में था जो घुटा हुआ !!
इजहारे प्यार में सोचता हूँ मैं !
कैसे करूँ पेश दिल टूटा हुआ !!
आँसू से लिखी जो अपनी कहानी !
मेरा फसाना देखो अनुठा हुआ !!

64.प्यासा सावन हूँ मैं !

उजड़ा हुआ इक चमन हूँ मैं !
बिखरा हुआ इक गुलशन हूँ मैं !!
रगों में खून नहीं आँसू बह रहे !
दर्द भरी यादों की चूभन हूँ मैं !!
चाहत की चिता को देता हूँ आग !
अरमानों का जिन्दा कफन हूँ मैं !!
दिल में दर्द है अश्क आँखों में मेरे !
कांटो में पलता वो सुमन हूँ मैं !!
औरों के इशारे पर हँसता रोता !
क्या करूँ ‘अजनबी’ दर्पण हूँ मैं !!
रेत से सीप को अपनालो कोई !
दिल का अनमोल रतन हूँ मैं !!
अश्के गम पी के है बुझाई प्यास !
आज फिर भी प्यासा-सावन हूँ मैं !!
लोग कहें बुझता हुआ चिराग !
उम्मींद की आखरी किरण हूँ मैं !!
आरजू नहीं रहीं दिल में अब !
जिन्दगी नहीं ऐसा जीवन हूँ मैं !!
एक था ‘कृष्ण’ जिसकी लाखों दिवानी !
इक ‘राधा’ नहीं वो ‘किशन’ हूँ मैं !!

63.मुस्कान ढूँढ रहा हूँ मैं !

अश्क आँखों में लिये मुस्कान ढूँढ रहा हूँ मैं !
आदमियों की भीड़ में इंसान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
सुना सकूँ मैं भी किसी को अपने दिल की बातें !
बहरों के बीच ऐसा कान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
अमन पलता हो जहाँ रह सकूँ सुकून से !
मुद्दत से एक ऐसा मकान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
पर कटे हैं पर उड़ने की ख्वाहिश है बाकी !
पिंजड़े में कैद हो आसमान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
अर्से बीत गये आँसू बहाये प्यार में किसी के !
जख्म भरा दिलका वो निशान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
बस जाये आकर निगाहों मैं जो कभी न जाये !
दिल का इक ऐसा मेहमान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
दिल के बदले में मिले एक प्यार भरा दिल !
दिल के बाजार में एक ऐसी दुकान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
कल तक हमें नाज था आज अफसोस क्यो है !
खोई हुई अपनी पहचान ढूँढ रहा हूँ मैं !!
जिसकी हर अदायों पे हो निसार मेरा दिल !
ऐसी खूबसूरत साहेबान ढूँढ रहा हूँ मैं !!

62.जिन्दगी अधूरी !

बिन प्रियतमा मेरी जिन्दगी अधूरी !
शौक नहीं जीने का पर है मजबूरी !!
यादें वफा व वादों के दिल पर !
वक्त ने चलाई है आज तेज धूरी !!
दिली ख्वाहिश वो तमन्नाएँ आरजू !
दिल की जमीं पर मेरी हुई न पूरी !!
गलतफहमियाँ क्या गुल खिला दी !
बढ़ती गयी दिल से दिल की दूरी !!
सफाई देने शिकवा-ए-बेवफाई की !
मुझे उनसे मिलना है सख्त जरूरी !!
बाहों में बाहें निगाहों में वो सचपूछो !
हसीन लगती थी कितनी शाम सिन्दूरी !!
तलाश रही है उन्हें कबसे निगाहें !
छिपी हैं दिल में वो मानों जैसे कस्तुरी !!
जब जब भी आता उनकी यादों का झोंका !
पीता हूँ मैं यूँ आँसू भर भर अँजुरी !!
मिला था मुझको एक प्यार भरा दिल !
किस्मत ने नहीं दी मिलने की मंजुरी !!

61. तेरी यादों में खोया हूँ !

आज भी तेरी प्यार में खोया हूँ देख !
बिखरे ख्वाबों को यूं संजोया हूँ देख !!
तुझसे जुदा हो के भी इस दिल में !
तेरी चाहत का बीज बोया हूँ देख !!
तरस तरस के बरसें हैं नैन !
तेरी यादों में कितना रोया हूँ देख !!
गोद है तेरी न गुलाब का बिस्तर !
कांटों की सेज में सोया हूँ देख !!
तुने जो निशानी में दिया रूमाल था !
आँसू से कैसे उसे भीगोया हूँ देख !!
मिल के बाटें होते दुःख दर्द दोनों !
जिस बोझ को अकेले ढोया हूँ देख !!
इश्क के जुर्म में मुझे अश्क ही मिले !
आँसू से गुनाहों को मैं धोया हूँ देख !!
तेरी चाहत की झील में ‘अजनबी ’ !
जीवन नैया मेरी डुबोया हूँ देख !!

60.कटी पतंग हूँ मैं !

जिन्दगी से आ गया तंग हूँ मैं !
देख दिल के हादसे दंग हूँ मैं !!
जुड़ नहीं सकता फिर से कभी !
ऐसा कटा हुआ अंग हूँ मैं !!
जी तो रहा हूँ बस जीने के लिए !
हृदय से जबकि अपंग हूँ मैं !!
मचलता था कभी तुफान में मैं भी !
सर पटकता आज तरंग हूँ मैं !!
जब से छुटा साथ उनका मेरा !
आज अकेला तन्हा निःसंग हूँ मैं !!
विजय हुई न पराजय कभी !
मुद्दत से छिड़ी हुई ऐसी जंग हूँ मैं !!
प्रीत डोर से बंध उड़ा नभ में !
आज लेकिन कटी - पतंग हूँ मैं !!
सपने हैं न अरमन जीवन में !
वक्त से हारी ऐसी उमंग हूँ मैं !!
कोई तो परखे तुलिका मे मुझे !
तस्वीरें प्यार का कैसा रंग हूँ मैं !!
किस को बताऊं मैं कैसे ‘अजनबी ’ !
जिसकी खातिर यूँ बदरंग हूँ मैं !!

Wednesday, July 7, 2010

59. बगावत करूँ बता !

तेरी बेवफाई की किससे शिकायत करूँ बता !
तुझे छोड़ अब मैं किससे मुहब्बत करूँ बता !!
तुझे दिल अपना दिया तो घायल हुआ हूँ ऐसे !
दिल देने किसी और को कैसे हिम्मत करूँ बता !!
दिल के मंदिर में तुझे बिठा पूजा की मैंने तेरी !
किस मुंह से किसी और का इबादत करूँ बता !!
याद आते ही तेरी छलक रहे हैं यूँ आँसू मेरे !
इन आँसुओं की भला कैसे हिफाजत करूँ बता !!
तेरा साथ होता तो जमाने को भी झूका सकता था !
तुझसे जुदा होके मैं किससे बगावत करूँ बता !!
तेरी चाहत ने ‘अजनबी ’को दी ऐसी सीख है !
तुझे चाहकर किस की और चाहत करूँ बता !!
बेखुदी में दिल खोकर तुझसे ये हादसा हुआ !
फिर किसी को क्यूं दिल देने की उल्फत करूँ बता !!

58. चाहत नहीं रही !

चाहत नहीं रही दिल में किसी के चाह की !
नहीं जरूरत किसी के प्यार के पनाह की !!
होने लगी है नफरत प्यार से हमें अब !
जब जब की हमनें मुहब्बत अथाह की !!
पहली बार में ही दिल दे बैठे प्यार हो गया !
तारीफ करते हैं आज भी उस निगाह की !!
दिल में बिठाया जिसे इबादत की जिसकी !
अपनों की न गैरों की हमनें परवाह की !!
कैसे करूँ जिक्र उस बेवफा मुहब्बत का !
जिसकी खतिर हमने जिन्दगी तबाह की !!
दिल से चाहा जिसे मांगा रब से दुआएं की !
उसी ने है हमें रूश्वा किया बेपनाह की !!
अश्क आँखों में लिए दिल में दर्द प्यार का !
भुगत रहे हम सजा जाने किस गुनाह की !!
आज भी तड़पता है दिल रोते हैं ये नैन !
याद आती कहानी जब प्यार भरी राह की !!
चाहा पर नहीं जरूरत मुझे ऐसी सलाह की !!

57. गुनगुना न सके !

अपना न सके उन्हें ठुकरा न सके !
चाहा कभी था जिसे हम पा न सके !!
याद आती रही हमेशा उनकी !
जिन्दगी में मेरी वो आ न सके !!
दिल के तार संगीत देते रहे सदा !
होंठ हैं कि गाने गुनगुना न सके !!
जिन्दगी में ऐसे भी आए हैं मोड़ !
देख दुर से उन्हें पर भुला न सके !!
भरी महफील में थे अकेले हम !
रोता रहा दिल आँसू बहा न सके !!
बिखर गया गुलिस्ता अरमानों का !
फिर से जिसे हम सजा न सके !!
ऐसे लिखा दिल में उनका नाम कि !
लाखों कोशिश की पर भुला न सके !!
बीता हुआ कल है वो मेरे लिए !
बुलाने पर लौट के जा न सके !!
दर्द ऐसा दिया उस हम दर्द ने !
जिसे हमदर्दी हम जता न सके !!
दिल है कि मानता नहीं क्या करें !
दिल को दिलासा हम दिला न सके !!
हँसते हुये देखा उन्होनें हमें !
हम हैं कि जरा मुस्कुरा न सके !!
प्यार हुए थे हम ऐसे अंधे !
सच क्या है झुठ क्या है हम बता न सके !!
ऐसे उलझ गये हम क्यों ‘अजनबी ’ !
अपनी गुत्थी हम खुद सुलझा न सके !!
कोशिश तो बहौत की हमने मगर !
आज तक हम उन्हें भुला न सके !!
अर्से बीत गये उनसे जुदा हुये !
फिर भी दिल से कर जुदा न सके !!
अफसोस बन रह गयी कुछ बातें !
चाहते हुए भी जिसे सुना न सक

56.नमी पल रही थी !

उनकी दाल जब गल रही थी !
अपनी दाल तब जल रही थी !!
मायूसी से मातम मनाता था मैं !
मारे खुशी के वो मचल रही थी !!
मेरे घर के दिये बुझ रहे थे !
जोरों से हवा चूंकि चल रही थी !!
खुशी के आँसू थे आँखों में उनकी !
मेरी आँखों में नमीं पल रही थी !!
सजने लगी जब उनकी डोली !
मेरी अर्थी तब निकल रही थी !!
हो रही थी आबाद जब उनकी दुनिया !
बर्बादी मुझे यूँ निगल रही थी !!
उनकी उम्मीदें ज्यों बंधने लगी !
अपनी आस तब ढल रही थी !!
होने लगी जब उनकी सुबह !
अपनी शाम तब ढल रही थी !!
मकाने प्यार मेरा ढह रहा था !
उनकी नींव जब ढल रही थी !!
जिनके कदमों में बिछाये फूल !
वहीं दिल को यूँ कुचल रही थी !!
दिल ने किया था भरोसा जिनका !
वर्षों से वो मुझको छल रही थी !!
उनके हाथों में थी मेंहदी रची !
आरजू मेरी हाथ मल रही थी !!
यादों में उनकी जलता था दिल !
आस्मां के संग जमी जल रही थी !!
घुट रहा था दम जिस वक्त मेरा !
खुशी से वो लड्डू निगल रही थी !!
मुँह लटकाये मैं पीता आँसू था !
पान - सुपारी वो चगल रही थी !!
उन्हें भुलने की नाकाम कोशिश में !
उनकी यादें दे दखल रही थी !!
गीत खुशी के थे होंठो में उनके !
यादों में रो मेरी गजल रही थी !!
वो होती तो कैसा होता ‘अजनबी’ !
उनकी कमी मुझे खल रही थी !!

55.उजडे़ प्यार का मंजर !

उजड़े प्यार का मेरा यूँ मंजर देखिये !

किसने चलाया दिल पे खंजर देखिये !!

कल तक उगी हरी घास थी चाहत की !

कैसे हुआ आज ये दिल बंजर देखिये !!

यादो में किसी की यूँ रोते रोते ‘अजनबी ’ !

ढिली पड़ी मेरी ये अस्थी पंजर देखिये !!

बहाते बहाते आँसू धंस गई अँखियाँ !

प्यार ने किया कैसा जादू मंतर देखिये !!

सपने अरमान ख्वाब बिखर गये मेरे !

लहूलूहान ये दिल के अंदर देखिये !!

उनकी आँखों से छलकते आँसू ख़ुशी के !

आँसू आँसू में है कितना अंतर देखिये !!

कहते हैं लोग इश्क आग का दरिया है !

मैंने बनाए अश्क समंदर देखिये !!


54.घर मेरा उजड़ गया !

बसने से पहले ही घर मेरा उजड़ गया !

समय कुछ ऐसा मंत्र कानो में यूँ पढ़ गया !!

मुड़कर देखा नही मैं ने कभी मुहब्बत में !

बस राहे प्यार मे यूँ आगे ही आगे बढ़ गया !!

आँसूओं से भीगोये मैंने दिल के हर पन्ने !

प्यास बुझाने चाहत की दिल घड़ा घड़ गया !!

काँटो के जंगल में किया यूँ सफर रोते रोते !

लांधा सागर गहरा ऊँचे पहाड़ चढ़ गया !!

आँखे खुली तो टुटा आज मेरे प्यार का भरम !

काँटा था या काँच का टुकडा जो पाँव में गड़ गया !!

मेरे अरमानों का लगा मुरझाने गुलदस्ता !

पीले पत्ते की तरह सपना मेरा झड़ गया !!

एक हवा का झोंका था या बुरे समय की आँघी !

मुद्दत से लगाया प्यार का पौघा उखड़ गया !!

मेरे दिल की अंगूठी तो खाली थी कल तलक !

नाम उनका नगींना बन दिल मे यूँ जड़ गया !!

प्यार नहीं मिला था किसी का फिर भी मैं खुश था !

आज मिला प्यार तो लगा किससे पाला पड़ गया !!

बहुत मनाया मैंने इस दिल को पर न माना !

जाने ऐसी क्या बात थी जो जीद में यूँ अड़ गया !!

आँखे बरस पड़ी मेरी यकायक ‘अजनबी ’ !

दर्द का बादल आँसू बन जब उमड़ गया !!


53.चाँदनी कर दी !

हमने तो उनके नाम अपनी जिन्दगी कर दी !

अर्सा एक या दो नही पूरी की पूरी सदी कर दी !!

अमा की अंघेरी रात में जुगनू बन जिये हम !

नाम उनके पूनम की रात और चाँदनी कर दी !!

जीवन के सफर में हमें जो कुछ भी मिले थे !

गम लिये हम जिन्दगी में उनकी ख़ुशी भर दी !!

राहें प्यार में जाहिर है फूल भी मिलेंगे काँटे भी !

काँटे हम्ही ने बाँटे उनके हिस्से हरियाली कर दी !!

काँटे की राहों पर चलते रहे पर आह न की !

जब हिम्मत ही न थी उनमे तो क्यो हामी भर दी !!

रंगीन सपने बहार फिजां महफिल दिये उन्हें !

अश्के गम दर्दे दिल से हमने दोस्ती कर ली !!

उनकी यादों मे अपना दिल जला कर हमने !

पी गये अंघियारे उनके हिस्से रौशनी कर दी !!

मेरी मुहब्बत पे उन्हें भरोसा नही था शायद !

इसीलिए किसी दुसरे से उन्होने शादी कर ली !!

ऐसी क्या वजह थी जो उनकी जुबां खुल न सकी !

जब घरवालो ने उनकी और से सगाई कर दी !!

अपने अरमानो का गला घोटा हमने प्यार में !

आरजुओं ने तमन्नाओं ने भी ख़ुदकुशी कर ली !!

तरस खाके लोगो ने पुछा ये क्या किया ‘अजनबी ’!

दिल जलाकर उनकी जिन्दगी दीवाली कर दी !!


52.किसने भरी नफरत !

किसने भरी नफरत इन निगाहों में !

खाई हैं चोट चूँकि मुहब्बत की राहों में !!

फरियाद अमन की करते रहे लब !

छीनता गया चैन यूँ बेचैन पनाहों में !!

अपने साये से भी यूँ डरने लगे हम !

इस कदर भरी दहशत हवाओं में !!

जलती रही बस्तियाँ चाहत की अपनी !

आहें मासूम चीखे दब नई कराहो में !!

शोलों की तरह टपके है आँखो से अश्क !

प्यार छूपा होता था कभी जिन निगाहो में !!

आज नफरत का क्यों यूँ आलम है छाया !

बिताई है जिन्दगी जबकि किसी की चाहो में !!

जुदाई तन्हाई रुसवाई और बेवफाई !

रंजोगम सितम शमिल है गवाई में !!

प्यार की डगर को करने लगे सलाम !

खोये थे दोनों एक दुजे की बांहों में !!

जुदा हुए कैसे राघा किशन ‘अजनबी ’!

कैसी सजा मिली उन्हें प्यार के गुनाहों में !!


51.जुदाई की सर्द रातों में !

प्यार का नाम सुनते ही क्यों काँप रहा हूँ !

क्या प्यार के नाम पर अभिशाप रहा हूँ !!

अष्क के समन्दर में उतर कर आज !

तेरे प्यार की गहराईयाँ नाप रहा हूँ !!

नफरत थी या मुहब्बत तेरे दिल में !

तेरी नजरों से यही तो मैं भाँप रहा हूँ !!

जुदाई की सर्द रातों दिल जलाकर !

अकेले मकान में यूं आग ताप रहा हूँ !!

प्यार हुए है जो जो हादसे मेरे साथ !

उस पर आज कर पश्चाताप रहा हूँ !!

लिहाजा सुनकर आज यूँ प्यार का नाम !

‘‘तौबा तौबा’’ मैं अजनबी अलाप रहा हूँ !

तेरी यादों का बनाकर मैं प्यार का फसाना !

‘गुलदस्ता’ के रूप मे यूं आज छाप रहा हूँ !!

मेरे लिये तुम मानों मुहब्बत का खुदा थी !

लिहाजा मैं तुम्हारे नाम का कर जाप रहा हूँ !


50.जिन्दगी नसीब से !

गुजर गये वो आज मेरे दिल के करीब से !

कुछ न कह सका आज मैं अपने हबीब से !!

मांग था जिसे यूँ मैने रब से फरियाद कर !

मांग न सका मैं वो प्यार की जिन्दगी नसीब से !!

बेटी थी वो बडे घर की पर प्यार मुझे दिया !

काबिल समझा दिल लगाया इस गरीब से !!

कह न सका दिल तड़पते हुए अलविदा !

क्यों मिलाया उन्हें रब ने मुझ बदनसीब से !!

दिल का दर्द सहा न जाये दिखाया भी न जाये !

हादसे हुए हैं मेरे साथ यूँ ऐसे अजीब से !!

दोनों उमड़ पड़े थे दर्द की दास्तान लिखने !

एक आँसू बन आँखों से एक कलम की नींव से !!

दिल तो कहता मेरा तरसती है निगाहें !

होंठ लेना चाहते उनका नाम तहजीब से !!

इतने अरमानों से मैंने सजाया आशियाँ था !

बिखर गए दिल के पन्ने यूं बेतरतीब से !!

मुहब्बत में जीना तो क्या मरना भी मंजुर था !

समझ में आता नहीं जियें किस तरकीब से !!

मुकद्दर किया हैं यूँ तेरा फैसला ‘अजनबी’ !

किससे करेगा शिकायत ? अपने रकीब से !!


49.खुशबू नहीं है !

जीने की कोई आरजू नहीं है !

जीवन की कोई जुस्तजू नहीं है !!

काँटो में पलता वो गुलाब हूं!

मुझ में कोई खुशबू नहीं है !!

बेवफा है कौन बता मुझको !

यादे है तेरी पास तू नहीं है !!

तेरी यादों में रोये हैं इतने कि !

देख आँखो में आज आँसू नहीं है !!

आज भी लिखता मैं खून से खत !

क्या करूँ जो रग में लहू नही ह्रै !!

प्यासा खड़ा है ‘अजनबी’ आशिक !

पास फूल है पर मधु नहीं है !!

तेरे हम शक्ल को भी अपना लेता !

यहाँ तो कोई तेरी हुबहू नहीं है !!

मेरे दिल पर जो बीत रही है !

तुझे क्या पता तू रूबरू नहीं है !!



48.पैगाम हो तुम !

मेरी जिन्दगी की गुजरती हुई शाम हो तुम !

मेरे कारण पूरे कॉलेज में बदनाम हो तुम !!

मैं तो एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ प्यार का !

तुम्हीं तो मेरी मंजिल हो मेरा मुकाम हो तुम !!

मैं तो एक उजड़ा हुआ चमन हूँ चाहत का !

फिजां में महकी हुई बहारें तमाम हो तुम !!

मैंने जब दिल की बात कही तो तुमने कहा !

‘‘राधा हूँ मैं तुम्हारी आज से मेरे श्याम हो तुम’’!!

शायरी कहूँ या कविता तुम्हें ऐ मेरी जिन्दगी !

बज्म हो गजल हो मेरी मेरा कलाम हो तुम !!

कैसे करूँ में जिक्र तुम्हारा आज तुम्हीं बताओ !

दर्द भरी मुहब्बत का ऐसा पैगाम हो तुम !!

मैंने तो कर दी तुम्हारे नाम ता-उम्र जिन्दगी !

चाहे जमाना कहे मुझे प्यार के गुलाम हो तुम !!

आँसू से मिटाऊँ या अपने जिगर के खून मैं !

सच्चा हो या झूठा मगर एक इल्जाम हो तुम !!

दिल तो कहता है आज भी आवाज हूँ तुम्हें मैं !

कैसे पुकारूँ तुम्हें बताओ ऐसा नाम हो तुम !!

अपना न सका मैं तुम्हें आज ठुकरा न सका !

क्या करें ‘अजनबी’ जो एक ऐसा सलाम हो तुम !!


47.मै तो हूँ उपवास आज !

लिख रहा हूँ आँसूओं से अपना इतिहास आज !

तुम नहीं बस तुम्हारी यादें हैं मेरे पास आज !!

काबिल तो न था फिर क्यों लगा चाहने तुमको !

हो रहा मुझे अपनी औकात का एहसास आज !!

दासी बनके उदासी है छाई चेहरे पर देखो !

मैं तो हूँ ये मेरे नैन भी हैं कितने उदास आज !!

भूखा हूँ कब से तेरे झूठे प्यार का ऐ जाने वफा !

तेरी यादों के दिये जलाकर मैं तो हूँ उपवास आज !!

दिल की दहलीज पर तुम्हारी देख रही राह !

आँखें बिछाये अरमानों की मेरी जिन्दा लाश आज !!

नाम लेते सुकूं से समाजाता मौत के आगोश में !

प्यास चाहत की बुझा देती ‘गर तुम काश आज !!

तड़प रहा है दिल मेरा यूँ तुमसे होके जुदा !

इन निगाहों को भी है जिसै तुम्हारी तलाश आज !!

तुम बेवफा नही मेरी किस्मत है मुझ से खफा !

छोड़ ‘अजनबी’ जब खुद पे रहा नहीं विश्वास आज !!


46.ऐतराज अजनबी !

धक्का लगा है मेरे दिल को गहरा आज अजनबी !

जैसे मानो गिरी हों मुझ पर कोई गाज अजनबी !!

अपना समझके जिसपे मैं हो रहा था यूँ फिदा !

बेवफा निकली वो ऊपर से धोखेबाज अजनबी !!

मैंने पढ़ा है स्वयं उनके नाम आए यार का खत !

जिसमें छुपा है उन दोनों के प्यार का राज अजनबी !!

मासूम व भोली लग रही थी सूरत से वह !

सीरत से तो निकली चालू और दगाबाज अजनबी !!

अफसोस हो रहा है मुझको बेहद पछतावा भी !

उसकी चर्चा करने में भी आती है यूँ लाज अजनबी !!

जाने कितने अर्सो से उनका इश्क चला वे ही जाने !

वर्ना अबतक वे बनी थी वह सरताज अजनबी !!

ऐसी गहरी यूँ चोट लगी है दिल को कि क्या बताऊँ !

कहाँ ढूँढू मैं इसकी दवा कहाँ इलाज अजनबी !!

आज मुहब्बत से भी आने लगी है नफरत की बू !

जिस प्यार पर कल तक हमें था नाज अजनबी !!

जिसे कोई चाहे और वो किसी और को चाहती रहे !

इस बात पर किसे नहीं होगा ऐतराज अजनबी !!

कैसे करूँ मैं बयां दिल में उठ रहे ज्वारों को !

कैसे दूँ मैं अपनी भावनाओं को अल्फाज अजनबी !!

45.फरियाद में !

चाहा है हमने भी किसी को इतने तादाद में !

कि तड़प रहा दिल आज भी उनकी याद में !!

ये और बात है कि हमें अष्क ही मिले हमेषा !

दुआ की खातिर हाथ उठाये तो फरियाद में !!


44.जाने क्यों !

आज भी मेरे दिल में तेरी चाहत है जाने क्यों !

कल तक जो थी आज भी अव्याहत है जाने क्यों !!

तेरे इन गेसुओं के साये में ‘अजनबी’ मेरे !

बेचैन दिलको यूँ मिलती राहत है जाने क्यों !!


43.मेहबूबा था !

तेरी झील-सी आँखों में कभी मेरा दिल डुबा था !

तेरा चाँद-सा सुन्दर मुखड़ा मेरी मेहबूबा था !!

एक दुजे के लिए जीते थे उन दिनों ‘अजनबी’ !

हम दोनों के दौर-ए-इश्क भी बड़ा अजूबा था !!


42.आँसू बहे है !

तेरी यादों में न जाने मेरे कितने आँसू बहे है !
तेरे प्यार में न जाने मैं ने कितने गम सहे हैं !!
प्यार के इस पड़ाव पर मुझको याद आ रहा !
उपदेश देके ‘अजनबी‘ जो सब लोग कहे हैं !!

41.किस जुबां से !

धरती से कहूँ या आस्मां से कहूँ मैं !

तुझे बेवफ़ा किस जुबां से कहूँ मैं !!

कहा तो था कभी तुझे मैं ने जाने वफ़ा !

घुटा जो साथ तो किस अरमां से कहूँ मैं !!


4. दर्द !

जिंदगी से उब चला हूँ मैं !

दर्द की पनाहों में पला हूँ मैं !!

आज भी निशान हैं ‘अजनंबी‘ दिल में !

इश्क में इस कदर जला हूँ मैं !!

किसको सुनाऊँ अपना दुखड़ा !

किसको दिखाऊँ दिल का टुकड़ा !!

साथी है न कोई हमदम मेरे !

वक्त भी है मुझसे उखड़ा -उखड़ा !!

39.फूल !

फूलों की चाह में हमने गले काँटों को लगाया !
आँखें खुलीं तो सपनों को लहूलूहान पाया !!
हमें क्या पता कभी शुल बन चूभेगें दिल को !
जिनकी राहों में हमने कभी गुलाब बिछाया !!

38.तबाही देखिये !

प्यार की राह में भटका इक राही देखियें !
प्यार के नाम पर हुई कैसी तबाही देखियें !!
बह रहे आँखों से अश्क व जिगर से खून !
कलम की नीब से बनके कैसे स्याही देखियें!!

37.अफसोस रहा है !

जीवन को जीवन आज कितना कोस रहा है !
जीवन में चूंकि अपसोस ही अफसोस रहा है !!
लाखों तीर चले है इस जख्मी दिल पर मेरे !
खून के आँसू रोये है फिर भी लब खामोश रहा है!!
किससे करूँ मैं शिकवा किसकी करूँ शिकायत !
अपनी फुटी तिकदीर का ही तो दोष रहा है !!
‘आहे-करोहे-आँसू-टीस-गम-सितम’ शब्दों से ही !
आज भरपुर मेरा जीवन-शब्द कोष रहा है !!
सिसक सिसक कर दिल रो रहा हमेशा !
क्या करें जो दर्द दिल के अड़ोस-पड़ोस रहा है !!
आखें खुलीं तो टूटा आज मेरे प्यार का भरम !
वर्ना अबतक तो दिल प्यार में मदहोश रहा हैं !!
वक्त के साथ ढह रही ईटे एक एक करकें !
उजड़ने का कारण ‘अजनबी ‘ कुछ ठोस रहा हैं !!
दिल से जिसे मैंने अपनाया उसे पा न सका !
इसी कारण ही तो मन में असंतोष रहा हैं !!