Wednesday, July 7, 2010

46.ऐतराज अजनबी !

धक्का लगा है मेरे दिल को गहरा आज अजनबी !

जैसे मानो गिरी हों मुझ पर कोई गाज अजनबी !!

अपना समझके जिसपे मैं हो रहा था यूँ फिदा !

बेवफा निकली वो ऊपर से धोखेबाज अजनबी !!

मैंने पढ़ा है स्वयं उनके नाम आए यार का खत !

जिसमें छुपा है उन दोनों के प्यार का राज अजनबी !!

मासूम व भोली लग रही थी सूरत से वह !

सीरत से तो निकली चालू और दगाबाज अजनबी !!

अफसोस हो रहा है मुझको बेहद पछतावा भी !

उसकी चर्चा करने में भी आती है यूँ लाज अजनबी !!

जाने कितने अर्सो से उनका इश्क चला वे ही जाने !

वर्ना अबतक वे बनी थी वह सरताज अजनबी !!

ऐसी गहरी यूँ चोट लगी है दिल को कि क्या बताऊँ !

कहाँ ढूँढू मैं इसकी दवा कहाँ इलाज अजनबी !!

आज मुहब्बत से भी आने लगी है नफरत की बू !

जिस प्यार पर कल तक हमें था नाज अजनबी !!

जिसे कोई चाहे और वो किसी और को चाहती रहे !

इस बात पर किसे नहीं होगा ऐतराज अजनबी !!

कैसे करूँ मैं बयां दिल में उठ रहे ज्वारों को !

कैसे दूँ मैं अपनी भावनाओं को अल्फाज अजनबी !!

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