धक्का लगा है मेरे दिल को गहरा आज अजनबी !
जैसे मानो गिरी हों मुझ पर कोई गाज अजनबी !!
अपना समझके जिसपे मैं हो रहा था यूँ फिदा !
बेवफा निकली वो ऊपर से धोखेबाज अजनबी !!
मैंने पढ़ा है स्वयं उनके नाम आए यार का खत !
जिसमें छुपा है उन दोनों के प्यार का राज अजनबी !!
मासूम व भोली लग रही थी सूरत से वह !
सीरत से तो निकली चालू और दगाबाज अजनबी !!
अफसोस हो रहा है मुझको बेहद पछतावा भी !
उसकी चर्चा करने में भी आती है यूँ लाज अजनबी !!
जाने कितने अर्सो से उनका इश्क चला वे ही जाने !
वर्ना अबतक वे बनी थी वह सरताज अजनबी !!
ऐसी गहरी यूँ चोट लगी है दिल को कि क्या बताऊँ !
कहाँ ढूँढू मैं इसकी दवा कहाँ इलाज अजनबी !!
आज मुहब्बत से भी आने लगी है नफरत की बू !
जिस प्यार पर कल तक हमें था नाज अजनबी !!
जिसे कोई चाहे और वो किसी और को चाहती रहे !
इस बात पर किसे नहीं होगा ऐतराज अजनबी !!
कैसे करूँ मैं बयां दिल में उठ रहे ज्वारों को !
कैसे दूँ मैं अपनी भावनाओं को अल्फाज अजनबी !!
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