Wednesday, July 7, 2010

58. चाहत नहीं रही !

चाहत नहीं रही दिल में किसी के चाह की !
नहीं जरूरत किसी के प्यार के पनाह की !!
होने लगी है नफरत प्यार से हमें अब !
जब जब की हमनें मुहब्बत अथाह की !!
पहली बार में ही दिल दे बैठे प्यार हो गया !
तारीफ करते हैं आज भी उस निगाह की !!
दिल में बिठाया जिसे इबादत की जिसकी !
अपनों की न गैरों की हमनें परवाह की !!
कैसे करूँ जिक्र उस बेवफा मुहब्बत का !
जिसकी खतिर हमने जिन्दगी तबाह की !!
दिल से चाहा जिसे मांगा रब से दुआएं की !
उसी ने है हमें रूश्वा किया बेपनाह की !!
अश्क आँखों में लिए दिल में दर्द प्यार का !
भुगत रहे हम सजा जाने किस गुनाह की !!
आज भी तड़पता है दिल रोते हैं ये नैन !
याद आती कहानी जब प्यार भरी राह की !!
चाहा पर नहीं जरूरत मुझे ऐसी सलाह की !!

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