Wednesday, July 7, 2010

57. गुनगुना न सके !

अपना न सके उन्हें ठुकरा न सके !
चाहा कभी था जिसे हम पा न सके !!
याद आती रही हमेशा उनकी !
जिन्दगी में मेरी वो आ न सके !!
दिल के तार संगीत देते रहे सदा !
होंठ हैं कि गाने गुनगुना न सके !!
जिन्दगी में ऐसे भी आए हैं मोड़ !
देख दुर से उन्हें पर भुला न सके !!
भरी महफील में थे अकेले हम !
रोता रहा दिल आँसू बहा न सके !!
बिखर गया गुलिस्ता अरमानों का !
फिर से जिसे हम सजा न सके !!
ऐसे लिखा दिल में उनका नाम कि !
लाखों कोशिश की पर भुला न सके !!
बीता हुआ कल है वो मेरे लिए !
बुलाने पर लौट के जा न सके !!
दर्द ऐसा दिया उस हम दर्द ने !
जिसे हमदर्दी हम जता न सके !!
दिल है कि मानता नहीं क्या करें !
दिल को दिलासा हम दिला न सके !!
हँसते हुये देखा उन्होनें हमें !
हम हैं कि जरा मुस्कुरा न सके !!
प्यार हुए थे हम ऐसे अंधे !
सच क्या है झुठ क्या है हम बता न सके !!
ऐसे उलझ गये हम क्यों ‘अजनबी ’ !
अपनी गुत्थी हम खुद सुलझा न सके !!
कोशिश तो बहौत की हमने मगर !
आज तक हम उन्हें भुला न सके !!
अर्से बीत गये उनसे जुदा हुये !
फिर भी दिल से कर जुदा न सके !!
अफसोस बन रह गयी कुछ बातें !
चाहते हुए भी जिसे सुना न सक

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