प्यार का नाम सुनते ही क्यों काँप रहा हूँ !
क्या प्यार के नाम पर अभिशाप रहा हूँ !!
अष्क के समन्दर में उतर कर आज !
तेरे प्यार की गहराईयाँ नाप रहा हूँ !!
नफरत थी या मुहब्बत तेरे दिल में !
तेरी नजरों से यही तो मैं भाँप रहा हूँ !!
जुदाई की सर्द रातों दिल जलाकर !
अकेले मकान में यूं आग ताप रहा हूँ !!
प्यार हुए है जो जो हादसे मेरे साथ !
उस पर आज कर पश्चाताप रहा हूँ !!
लिहाजा सुनकर आज यूँ प्यार का नाम !
‘‘तौबा तौबा’’ मैं अजनबी अलाप रहा हूँ !
तेरी यादों का बनाकर मैं प्यार का फसाना !
‘गुलदस्ता’ के रूप मे यूं आज छाप रहा हूँ !!
मेरे लिये तुम मानों मुहब्बत का खुदा थी !
लिहाजा मैं तुम्हारे नाम का कर जाप रहा हूँ !
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