Wednesday, July 7, 2010

51.जुदाई की सर्द रातों में !

प्यार का नाम सुनते ही क्यों काँप रहा हूँ !

क्या प्यार के नाम पर अभिशाप रहा हूँ !!

अष्क के समन्दर में उतर कर आज !

तेरे प्यार की गहराईयाँ नाप रहा हूँ !!

नफरत थी या मुहब्बत तेरे दिल में !

तेरी नजरों से यही तो मैं भाँप रहा हूँ !!

जुदाई की सर्द रातों दिल जलाकर !

अकेले मकान में यूं आग ताप रहा हूँ !!

प्यार हुए है जो जो हादसे मेरे साथ !

उस पर आज कर पश्चाताप रहा हूँ !!

लिहाजा सुनकर आज यूँ प्यार का नाम !

‘‘तौबा तौबा’’ मैं अजनबी अलाप रहा हूँ !

तेरी यादों का बनाकर मैं प्यार का फसाना !

‘गुलदस्ता’ के रूप मे यूं आज छाप रहा हूँ !!

मेरे लिये तुम मानों मुहब्बत का खुदा थी !

लिहाजा मैं तुम्हारे नाम का कर जाप रहा हूँ !


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