Thursday, July 8, 2010
100.पाण्डुलिपियाँ !
99.खुदकुशी से !
98.दावत में !
97.कमी रह गयी !
96.संजो सकूँ !
97.कोई तो नहीं !
94.एक यादगार अजनबी !
93.मुबारकबाद अजनबी !
92.रोती थी तू !
91.सपनो की रानी तो हुई !
90.दस साल हो गये !
89.गवाही देखना !
88.मजबूर है अजनबी !
87. मधुमास न ढूँढो !
86.राजमहल मिला !
85.खत खून से लिखा था !
84.फरियाद कर रहा हूँ !
83.मेरी बाहों में !
82.सुहाग रात होती !
81.सपने सजाये थे !
जिन्दगी में अपनी जब वो पहली बार आये थे !!
देख उन्हें घड़का था यह बेताब दिल अपना !
पहले प्यार का पहला पैगाम जब वो लाए वे !!
गुजारे थे वक्त कभी आहे भर भर सपने में !
प्यार के उस आलम में बस वो ही वो समाये थे !!
आहट से कभी-कभी रूक-सी जाती थी घड़कने !
इक झलक के लिये हमें वो इतना तरसाये थे !!
दर्द में भी छलक पड़ते थे आँसू खूशी के यूँ ही !
जब हाथों में हमने उनके नाम गुदवाये थे !!
गुनगुना नही सकते हम आज इस कदर !
प्यार के जिस गीत को हम दो मिलकर गाये थे !!
आज भी आती है उनकी याद यूँ आती रहेगी !
सच प्यार में हमने कितने आँसू बहाये थे !!
काश वो आ जाती मेरी सूनी जिन्दगी में फिर से !
जन्मदिन के मौके पर ज्यो तोहफा लेकर आए थे !!
किससे कहें हम दिल की बात आज ‘अजनबी ’!
वो नही है जिन्हें कभी अपने किस्से सुनाये थे !!
80.दिल के मेहमां थे !
79.फूट फूट रोती है !
78.जीवन में रक्खा क्या है !
77.आखरी पैगाम है !
76.इतिहास अजनबी !
75.आँसुओं की झील !
74.रब की मर्जी !
73.प्यार क्यों किया !
72.तू न मिली मुझको !
71.धोखा था सनम !
70.औकात नहीं भूली !
69.दिली इरादा था !
68.तेरी तलाश में !
67.दीवाना था अजनबी !
66.यादों की खरोंच से !
65.दिल टूटा हुआ !
64.प्यासा सावन हूँ मैं !
63.मुस्कान ढूँढ रहा हूँ मैं !
62.जिन्दगी अधूरी !
61. तेरी यादों में खोया हूँ !
60.कटी पतंग हूँ मैं !
Wednesday, July 7, 2010
59. बगावत करूँ बता !
58. चाहत नहीं रही !
57. गुनगुना न सके !
56.नमी पल रही थी !
55.उजडे़ प्यार का मंजर !
उजड़े प्यार का मेरा यूँ मंजर देखिये !
किसने चलाया दिल पे खंजर देखिये !!
कल तक उगी हरी घास थी चाहत की !
कैसे हुआ आज ये दिल बंजर देखिये !!
यादो में किसी की यूँ रोते रोते ‘अजनबी ’ !
ढिली पड़ी मेरी ये अस्थी पंजर देखिये !!
बहाते बहाते आँसू धंस गई अँखियाँ !
प्यार ने किया कैसा जादू मंतर देखिये !!
सपने अरमान ख्वाब बिखर गये मेरे !
लहूलूहान ये दिल के अंदर देखिये !!
उनकी आँखों से छलकते आँसू ख़ुशी के !
आँसू आँसू में है कितना अंतर देखिये !!
कहते हैं लोग इश्क आग का दरिया है !
मैंने बनाए अश्क समंदर देखिये !!
54.घर मेरा उजड़ गया !
बसने से पहले ही घर मेरा उजड़ गया !
समय कुछ ऐसा मंत्र कानो में यूँ पढ़ गया !!
मुड़कर देखा नही मैं ने कभी मुहब्बत में !
बस राहे प्यार मे यूँ आगे ही आगे बढ़ गया !!
आँसूओं से भीगोये मैंने दिल के हर पन्ने !
प्यास बुझाने चाहत की दिल घड़ा घड़ गया !!
काँटो के जंगल में किया यूँ सफर रोते रोते !
लांधा सागर गहरा ऊँचे पहाड़ चढ़ गया !!
आँखे खुली तो टुटा आज मेरे प्यार का भरम !
काँटा था या काँच का टुकडा जो पाँव में गड़ गया !!
मेरे अरमानों का लगा मुरझाने गुलदस्ता !
पीले पत्ते की तरह सपना मेरा झड़ गया !!
एक हवा का झोंका था या बुरे समय की आँघी !
मुद्दत से लगाया प्यार का पौघा उखड़ गया !!
मेरे दिल की अंगूठी तो खाली थी कल तलक !
नाम उनका नगींना बन दिल मे यूँ जड़ गया !!
प्यार नहीं मिला था किसी का फिर भी मैं खुश था !
आज मिला प्यार तो लगा किससे पाला पड़ गया !!
बहुत मनाया मैंने इस दिल को पर न माना !
जाने ऐसी क्या बात थी जो जीद में यूँ अड़ गया !!
आँखे बरस पड़ी मेरी यकायक ‘अजनबी ’ !
दर्द का बादल आँसू बन जब उमड़ गया !!
53.चाँदनी कर दी !
हमने तो उनके नाम अपनी जिन्दगी कर दी !
अर्सा एक या दो नही पूरी की पूरी सदी कर दी !!
अमा की अंघेरी रात में जुगनू बन जिये हम !
नाम उनके पूनम की रात और चाँदनी कर दी !!
जीवन के सफर में हमें जो कुछ भी मिले थे !
गम लिये हम जिन्दगी में उनकी ख़ुशी भर दी !!
राहें प्यार में जाहिर है फूल भी मिलेंगे काँटे भी !
काँटे हम्ही ने बाँटे उनके हिस्से हरियाली कर दी !!
काँटे की राहों पर चलते रहे पर आह न की !
जब हिम्मत ही न थी उनमे तो क्यो हामी भर दी !!
रंगीन सपने बहार फिजां महफिल दिये उन्हें !
अश्के गम दर्दे दिल से हमने दोस्ती कर ली !!
उनकी यादों मे अपना दिल जला कर हमने !
पी गये अंघियारे उनके हिस्से रौशनी कर दी !!
मेरी मुहब्बत पे उन्हें भरोसा नही था शायद !
इसीलिए किसी दुसरे से उन्होने शादी कर ली !!
ऐसी क्या वजह थी जो उनकी जुबां खुल न सकी !
जब घरवालो ने उनकी और से सगाई कर दी !!
अपने अरमानो का गला घोटा हमने प्यार में !
आरजुओं ने तमन्नाओं ने भी ख़ुदकुशी कर ली !!
तरस खाके लोगो ने पुछा ये क्या किया ‘अजनबी ’!
दिल जलाकर उनकी जिन्दगी दीवाली कर दी !!
52.किसने भरी नफरत !
किसने भरी नफरत इन निगाहों में !
खाई हैं चोट चूँकि मुहब्बत की राहों में !!
फरियाद अमन की करते रहे लब !
छीनता गया चैन यूँ बेचैन पनाहों में !!
अपने साये से भी यूँ डरने लगे हम !
इस कदर भरी दहशत हवाओं में !!
जलती रही बस्तियाँ चाहत की अपनी !
आहें मासूम चीखे दब नई कराहो में !!
शोलों की तरह टपके है आँखो से अश्क !
प्यार छूपा होता था कभी जिन निगाहो में !!
आज नफरत का क्यों यूँ आलम है छाया !
बिताई है जिन्दगी जबकि किसी की चाहो में !!
जुदाई तन्हाई रुसवाई और बेवफाई !
रंजोगम सितम शमिल है गवाई में !!
प्यार की डगर को करने लगे सलाम !
खोये थे दोनों एक दुजे की बांहों में !!
जुदा हुए कैसे राघा किशन ‘अजनबी ’!
कैसी सजा मिली उन्हें प्यार के गुनाहों में !!
51.जुदाई की सर्द रातों में !
क्या प्यार के नाम पर अभिशाप रहा हूँ !!
अष्क के समन्दर में उतर कर आज !
तेरे प्यार की गहराईयाँ नाप रहा हूँ !!
नफरत थी या मुहब्बत तेरे दिल में !
तेरी नजरों से यही तो मैं भाँप रहा हूँ !!
जुदाई की सर्द रातों दिल जलाकर !
अकेले मकान में यूं आग ताप रहा हूँ !!
प्यार हुए है जो जो हादसे मेरे साथ !
उस पर आज कर पश्चाताप रहा हूँ !!
लिहाजा सुनकर आज यूँ प्यार का नाम !
‘‘तौबा तौबा’’ मैं अजनबी अलाप रहा हूँ !
तेरी यादों का बनाकर मैं प्यार का फसाना !
‘गुलदस्ता’ के रूप मे यूं आज छाप रहा हूँ !!
मेरे लिये तुम मानों मुहब्बत का खुदा थी !
लिहाजा मैं तुम्हारे नाम का कर जाप रहा हूँ !
50.जिन्दगी नसीब से !
गुजर गये वो आज मेरे दिल के करीब से !
कुछ न कह सका आज मैं अपने हबीब से !!
मांग था जिसे यूँ मैने रब से फरियाद कर !
मांग न सका मैं वो प्यार की जिन्दगी नसीब से !!
बेटी थी वो बडे घर की पर प्यार मुझे दिया !
काबिल समझा दिल लगाया इस गरीब से !!
कह न सका दिल तड़पते हुए अलविदा !
क्यों मिलाया उन्हें रब ने मुझ बदनसीब से !!
दिल का दर्द सहा न जाये दिखाया भी न जाये !
हादसे हुए हैं मेरे साथ यूँ ऐसे अजीब से !!
दोनों उमड़ पड़े थे दर्द की दास्तान लिखने !
एक आँसू बन आँखों से एक कलम की नींव से !!
दिल तो कहता मेरा तरसती है निगाहें !
होंठ लेना चाहते उनका नाम तहजीब से !!
इतने अरमानों से मैंने सजाया आशियाँ था !
बिखर गए दिल के पन्ने यूं बेतरतीब से !!
मुहब्बत में जीना तो क्या मरना भी मंजुर था !
समझ में आता नहीं जियें किस तरकीब से !!
मुकद्दर किया हैं यूँ तेरा फैसला ‘अजनबी’ !
किससे करेगा शिकायत ? अपने रकीब से !!
49.खुशबू नहीं है !
जीने की कोई आरजू नहीं है !
जीवन की कोई जुस्तजू नहीं है !!
काँटो में पलता वो गुलाब हूं!
मुझ में कोई खुशबू नहीं है !!
बेवफा है कौन बता मुझको !
यादे है तेरी पास तू नहीं है !!
तेरी यादों में रोये हैं इतने कि !
देख आँखो में आज आँसू नहीं है !!
आज भी लिखता मैं खून से खत !
क्या करूँ जो रग में लहू नही ह्रै !!
प्यासा खड़ा है ‘अजनबी’ आशिक !
पास फूल है पर मधु नहीं है !!
तेरे हम शक्ल को भी अपना लेता !
यहाँ तो कोई तेरी हुबहू नहीं है !!
मेरे दिल पर जो बीत रही है !
तुझे क्या पता तू रूबरू नहीं है !!
48.पैगाम हो तुम !
मेरी जिन्दगी की गुजरती हुई शाम हो तुम !
मेरे कारण पूरे कॉलेज में बदनाम हो तुम !!
मैं तो एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ प्यार का !
तुम्हीं तो मेरी मंजिल हो मेरा मुकाम हो तुम !!
मैं तो एक उजड़ा हुआ चमन हूँ चाहत का !
फिजां में महकी हुई बहारें तमाम हो तुम !!
मैंने जब दिल की बात कही तो तुमने कहा !
‘‘राधा हूँ मैं तुम्हारी आज से मेरे श्याम हो तुम’’!!
शायरी कहूँ या कविता तुम्हें ऐ मेरी जिन्दगी !
बज्म हो गजल हो मेरी मेरा कलाम हो तुम !!
कैसे करूँ में जिक्र तुम्हारा आज तुम्हीं बताओ !
दर्द भरी मुहब्बत का ऐसा पैगाम हो तुम !!
मैंने तो कर दी तुम्हारे नाम ता-उम्र जिन्दगी !
चाहे जमाना कहे मुझे प्यार के गुलाम हो तुम !!
आँसू से मिटाऊँ या अपने जिगर के खून मैं !
सच्चा हो या झूठा मगर एक इल्जाम हो तुम !!
दिल तो कहता है आज भी आवाज हूँ तुम्हें मैं !
कैसे पुकारूँ तुम्हें बताओ ऐसा नाम हो तुम !!
अपना न सका मैं तुम्हें आज ठुकरा न सका !
क्या करें ‘अजनबी’ जो एक ऐसा सलाम हो तुम !!
47.मै तो हूँ उपवास आज !
लिख रहा हूँ आँसूओं से अपना इतिहास आज !
तुम नहीं बस तुम्हारी यादें हैं मेरे पास आज !!
काबिल तो न था फिर क्यों लगा चाहने तुमको !
हो रहा मुझे अपनी औकात का एहसास आज !!
दासी बनके उदासी है छाई चेहरे पर देखो !
मैं तो हूँ ये मेरे नैन भी हैं कितने उदास आज !!
भूखा हूँ कब से तेरे झूठे प्यार का ऐ जाने वफा !
तेरी यादों के दिये जलाकर मैं तो हूँ उपवास आज !!
दिल की दहलीज पर तुम्हारी देख रही राह !
आँखें बिछाये अरमानों की मेरी जिन्दा लाश आज !!
नाम लेते सुकूं से समाजाता मौत के आगोश में !
प्यास चाहत की बुझा देती ‘गर तुम काश आज !!
तड़प रहा है दिल मेरा यूँ तुमसे होके जुदा !
इन निगाहों को भी है जिसै तुम्हारी तलाश आज !!
तुम बेवफा नही मेरी किस्मत है मुझ से खफा !
छोड़ ‘अजनबी’ जब खुद पे रहा नहीं विश्वास आज !!
46.ऐतराज अजनबी !
धक्का लगा है मेरे दिल को गहरा आज अजनबी !
जैसे मानो गिरी हों मुझ पर कोई गाज अजनबी !!
अपना समझके जिसपे मैं हो रहा था यूँ फिदा !
बेवफा निकली वो ऊपर से धोखेबाज अजनबी !!
मैंने पढ़ा है स्वयं उनके नाम आए यार का खत !
जिसमें छुपा है उन दोनों के प्यार का राज अजनबी !!
मासूम व भोली लग रही थी सूरत से वह !
सीरत से तो निकली चालू और दगाबाज अजनबी !!
अफसोस हो रहा है मुझको बेहद पछतावा भी !
उसकी चर्चा करने में भी आती है यूँ लाज अजनबी !!
जाने कितने अर्सो से उनका इश्क चला वे ही जाने !
वर्ना अबतक वे बनी थी वह सरताज अजनबी !!
ऐसी गहरी यूँ चोट लगी है दिल को कि क्या बताऊँ !
कहाँ ढूँढू मैं इसकी दवा कहाँ इलाज अजनबी !!
आज मुहब्बत से भी आने लगी है नफरत की बू !
जिस प्यार पर कल तक हमें था नाज अजनबी !!
जिसे कोई चाहे और वो किसी और को चाहती रहे !
इस बात पर किसे नहीं होगा ऐतराज अजनबी !!
कैसे करूँ मैं बयां दिल में उठ रहे ज्वारों को !
कैसे दूँ मैं अपनी भावनाओं को अल्फाज अजनबी !!
45.फरियाद में !
चाहा है हमने भी किसी को इतने तादाद में !
कि तड़प रहा दिल आज भी उनकी याद में !!
ये और बात है कि हमें अष्क ही मिले हमेषा !
दुआ की खातिर हाथ उठाये तो फरियाद में !!
44.जाने क्यों !
आज भी मेरे दिल में तेरी चाहत है जाने क्यों !
कल तक जो थी आज भी अव्याहत है जाने क्यों !!
तेरे इन गेसुओं के साये में ‘अजनबी’ मेरे !
बेचैन दिलको यूँ मिलती राहत है जाने क्यों !!
43.मेहबूबा था !
तेरी झील-सी आँखों में कभी मेरा दिल डुबा था !
तेरा चाँद-सा सुन्दर मुखड़ा मेरी मेहबूबा था !!
एक दुजे के लिए जीते थे उन दिनों ‘अजनबी’ !
हम दोनों के दौर-ए-इश्क भी बड़ा अजूबा था !!
42.आँसू बहे है !
41.किस जुबां से !
धरती से कहूँ या आस्मां से कहूँ मैं !
तुझे बेवफ़ा किस जुबां से कहूँ मैं !!
कहा तो था कभी तुझे मैं ने जाने वफ़ा !
घुटा जो साथ तो किस अरमां से कहूँ मैं !!
4. दर्द !
जिंदगी से उब चला हूँ मैं !
दर्द की पनाहों में पला हूँ मैं !!
आज भी निशान हैं ‘अजनंबी‘ दिल में !
इश्क में इस कदर जला हूँ मैं !!
किसको सुनाऊँ अपना दुखड़ा !
किसको दिखाऊँ दिल का टुकड़ा !!
साथी है न कोई हमदम मेरे !
वक्त भी है मुझसे उखड़ा -उखड़ा !!
39.फूल !
38.तबाही देखिये !
37.अफसोस रहा है !
जीवन में चूंकि अपसोस ही अफसोस रहा है !!
लाखों तीर चले है इस जख्मी दिल पर मेरे !
खून के आँसू रोये है फिर भी लब खामोश रहा है!!
अपनी फुटी तिकदीर का ही तो दोष रहा है !!
‘आहे-करोहे-आँसू-टीस-गम-सितम’ शब्दों से ही !
आज भरपुर मेरा जीवन-शब्द कोष रहा है !!
सिसक सिसक कर दिल रो रहा हमेशा !
क्या करें जो दर्द दिल के अड़ोस-पड़ोस रहा है !!
वर्ना अबतक तो दिल प्यार में मदहोश रहा हैं !!
वक्त के साथ ढह रही ईटे एक एक करकें !
उजड़ने का कारण ‘अजनबी ‘ कुछ ठोस रहा हैं !!
दिल से जिसे मैंने अपनाया उसे पा न सका !
इसी कारण ही तो मन में असंतोष रहा हैं !!