Wednesday, July 7, 2010

56.नमी पल रही थी !

उनकी दाल जब गल रही थी !
अपनी दाल तब जल रही थी !!
मायूसी से मातम मनाता था मैं !
मारे खुशी के वो मचल रही थी !!
मेरे घर के दिये बुझ रहे थे !
जोरों से हवा चूंकि चल रही थी !!
खुशी के आँसू थे आँखों में उनकी !
मेरी आँखों में नमीं पल रही थी !!
सजने लगी जब उनकी डोली !
मेरी अर्थी तब निकल रही थी !!
हो रही थी आबाद जब उनकी दुनिया !
बर्बादी मुझे यूँ निगल रही थी !!
उनकी उम्मीदें ज्यों बंधने लगी !
अपनी आस तब ढल रही थी !!
होने लगी जब उनकी सुबह !
अपनी शाम तब ढल रही थी !!
मकाने प्यार मेरा ढह रहा था !
उनकी नींव जब ढल रही थी !!
जिनके कदमों में बिछाये फूल !
वहीं दिल को यूँ कुचल रही थी !!
दिल ने किया था भरोसा जिनका !
वर्षों से वो मुझको छल रही थी !!
उनके हाथों में थी मेंहदी रची !
आरजू मेरी हाथ मल रही थी !!
यादों में उनकी जलता था दिल !
आस्मां के संग जमी जल रही थी !!
घुट रहा था दम जिस वक्त मेरा !
खुशी से वो लड्डू निगल रही थी !!
मुँह लटकाये मैं पीता आँसू था !
पान - सुपारी वो चगल रही थी !!
उन्हें भुलने की नाकाम कोशिश में !
उनकी यादें दे दखल रही थी !!
गीत खुशी के थे होंठो में उनके !
यादों में रो मेरी गजल रही थी !!
वो होती तो कैसा होता ‘अजनबी’ !
उनकी कमी मुझे खल रही थी !!

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