Thursday, July 8, 2010

85.खत खून से लिखा था !

प्यार करना मैंने केवल तुझसे सीखा था !
अपने दिल पर बस तेरा ही नाम लिखा था !!
हसीना तो लाखों थी मेरी नजर के सामने !
मगर तेरी निगाहों में क्यों मुझको प्यार दिखा था !!
हम तो आए थे पेश नर्मी से तेरी चाहत में !
तेवर तेरे जलवा तेरा क्यों इतना तीखा था !!
मैंने तो चाहा था खून से तेरी मांग मैं भर दूँ !
मगर दाग बना माथे में जो प्यार का टीका था !!
बधाई देने तुझको तेरे ‘जन्मदिन’ पर !
ऊँगली काट कर मैंने खत खून से लिखा था !!
आज भी रखा हूँ दिल में तेरे प्यार को संजोके !
उड़ गया क्यों तेरे प्यार का रंग क्या फिका था !!
मेरी जिन्दगी में तो अब अंधेरा ही अंधेरा है !
खोया प्यार का प्रकाश जो जलाता दीप-शिखा था !!
कोशिश तो बहुत की तुझे समझने की मैंने !
पर समझा नहीं तेरे प्यार का जो सलिका था !!
किसी को चाहना भी आज क्यों गुनाह है ‘अजनबी’ !
तेरी मुहब्बत में यही सबक मैंने सीखा था !!

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