Thursday, July 8, 2010

79.फूट फूट रोती है !

आज भी मेरी आँखियाँ तुम्हारी
स्मृतियों में फूट फूट रोती है !
दिवस में देखती दिवा स्वप्न यूँ
और निशा में नही सोती है !!
सपनों के सुन्दर सुमन चुनकर
कल्पना में अल्पना के जाल बुनकर !
समय के धागे में साँसे मोति से पिरोती है !!
जीवन में अब तो स्मृतियाँ ही शेष है
बाकी जिन्दगी का मानो अवशेष है !
दीपक है न तेल बाती कहीं और नहीं कहीं ज्योति है !!
hriday को लगी यूँ जब से ठेस है
देश भी लगता क्यों मानों परदेस है !
यादों की गली में मेरी प्राण वायु,जीवन की गठरी ढोती है !!
बिखरे हुए सपनों को यूँ ही समेटकर
यादो की चाशनी में उन्हें लपेटकर !
प्यार की बस्ती बसाने की चाह में, बारबार पलकें भीगोती है!!

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