Wednesday, July 7, 2010

37.अफसोस रहा है !

जीवन को जीवन आज कितना कोस रहा है !
जीवन में चूंकि अपसोस ही अफसोस रहा है !!
लाखों तीर चले है इस जख्मी दिल पर मेरे !
खून के आँसू रोये है फिर भी लब खामोश रहा है!!
किससे करूँ मैं शिकवा किसकी करूँ शिकायत !
अपनी फुटी तिकदीर का ही तो दोष रहा है !!
‘आहे-करोहे-आँसू-टीस-गम-सितम’ शब्दों से ही !
आज भरपुर मेरा जीवन-शब्द कोष रहा है !!
सिसक सिसक कर दिल रो रहा हमेशा !
क्या करें जो दर्द दिल के अड़ोस-पड़ोस रहा है !!
आखें खुलीं तो टूटा आज मेरे प्यार का भरम !
वर्ना अबतक तो दिल प्यार में मदहोश रहा हैं !!
वक्त के साथ ढह रही ईटे एक एक करकें !
उजड़ने का कारण ‘अजनबी ‘ कुछ ठोस रहा हैं !!
दिल से जिसे मैंने अपनाया उसे पा न सका !
इसी कारण ही तो मन में असंतोष रहा हैं !!

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