Thursday, July 8, 2010

87. मधुमास न ढूँढो !

निराश जीवन में आस न ढूँढो !
निरस जीवन में उच्छवास न ढूँढो !!
खारेपन से भरा सागर हूँ मैं !
मुझ में पानी की मिठास न ढूँढो !!
मैं पतझर की हूँ सूखी टहनी !
मुझ में कोई मधुमास न ढूँढो !!
पत्थर की चट्टान है ये मेरा दिल !
इसमें चाहत की हरी घास न ढूँढो !!
बेजान कब से हूँ मैं जिन्दा लाश !
बंद है नाड़ी मेरी साँस न ढूँढो !!
खो चुका हूँ अब हौंसला अपना !
है ही नही, आत्म विश्वास न ढूँढो !!
विरह विषाद वेदना व्यथा से !
यूँ चूर उर में उल्लास न ढूँढो !!
जीवन जंगल का मैं भटका राही !
हूँ आज बेहद उदास न ढूँढो !!
कट गए पंख सारे ‘अजनबी’ !
उड़ने की चाह में आकाश न ढूँढो !!
जीवन साहित्य में मेरा शब्दार्थ !
व्याकरण-संधी -समास न ढूँढो !!
मुक्तक हूँ मैं, छन्दमुक्त मुझ में !
श्लेष, यमक, अनूप्रास न ढूँढो !!
बना रहा हूँ शब्दो की इमारत मैं !
किसने किया शिलान्यास न ढूँढो !!
शब्द ही तो सहारा है मेरे जीने का !
‘अर्थ’ लेकिन मेरे पास न ढूँढो !!
एक गुजारिश है आपसे मेरी !
भविष्य-हीनों का इतिहास न ढूँढो !!
किस कदर हुआ हूँ बर्बाद मैं !
कर के मेरा उपवास न ढूँढो !!
उब चुका हूँ इस माया मोह से !
मुझमें कोई भोग विलास न ढूँढो !!
लिख-लिख के मैं आँसू से कविता !
मिटा रहा हूँ दिल का भड़ास न ढूँढो !!
‘राधा-किशन’ की है लघु कहानी !
इसमें कोई उपन्यास न ढूँढो !!



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