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Saturday, June 12, 2010
18. ख़ामोशी
जब जब ख़ामोशी मुझ को लीलने लगती !
उनकी यादों की कली यूँ खिलने लगती !!
सन्नाटे के उस आलम में चूपके-चूपके !
आकर ‘अजनबी’ से कोई मिलने लगती !!
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